बंदिशें-अब्बा को एक ख़त
By Ansh Basoya
बाबा वो कुछ पूछना था आपसे
मेरी नज़्मों से आपको ये नफ़रत कैसी?
मुझे मायूस देखने की, आपकी ये हसरत कैसी?
कल मुझसे कलम छीनने में
आपने जान लगा दी,
मेरी सारी नज़्मों में
आपने आग लगा दी
इतनी ही शिद्दत से मेरे ख़्वाबों को हवा देते
तो क्या ही बात थी,
इन बेकार की बंदिशों की कोई ढंग की वजह देते
तो क्या ही बात थी
कौन समझाए आपको कि असली हिम्मत
सीख के नाम पर तमाचे जड़ने में नहीं,
बल्कि दुनिया से अपनों के लिए लड़ने में है
कि इन फ़िज़ूल के उसूलों से परे भी
एक जहान है,
जहाँ दिल की सुनना और मुस्कुराना
बहुत आसान है
बाबा, एक दफ़ा उन नज़्मों की राख से गुज़रके तो देखो
एक पन्ना मैंने आप पर भी लिखा था,
कि कैसे कलम पकड़ना
मैंने आप ही से सीखा था
कि कैसे आप मुझे समझ नहीं पाते
पर समझने की कोशिश बहुत करते हो,
बस मुझे कामयाब देखने की ही तो ख्वाहिश रखते हो
पर बाबा अब मुझसे
यूँ बंध कर रहा नहीं जाता,
आपका हर फ़ैसला मेरे अछे के लिए है
ये झूठ खुद से कहा नहीं जाता
क्यूँकि जो कहे मुझसे सब त्यागने को मेरा
वो भी सिर्फ़ उनके लिए, ऐसे लोग मेरे अपने नहीं,
तो फेंक दो हर काग़ज़, जला दो हर अफ़साना
पर जला पाओगे ये सपने नहीं।
By Ansh Basoya

Comments