फुटपाथ
By Dr. Madhulika Lakra
राजधानी में एक रात
बाजार से लौटते हुए
मैंने बहुत ध्यान से फुटपाथ देखा,
थके-हारे लोग
किस तरह से सोए हुए थे;
किसी के शरीर पर कोई एक
पतली सी चादर थी
और किसी के शरीर पर
फटी हुई चादर से कपड़े थे,
ट्रैफिक का शोर कितना था
फिर भी वो निश्चिंतता से सोए हुए थे
क्योंकि शरीर टूट गया होगा
दिनभर की मेहनत-मजदूरी से,
नींद कैसे आती होगी ?
उस कठोर सतह पर
उन असुरक्षित जगहों पर
लेकिन और क्या विकल्प है?
उन लोगों के पास,
अगर बारिश आ जाए अचानक
फिर वो भागकर कहां जाएंगे?
गाड़ियों की कतारों के बीच,
कितने लोग दिख गए ऐसे
और जो एक बात उन सबमें
एक समान थी,
वो यही था
कि वो सभी ही पुरुष थे;
अब क्या अर्थ निकला इस बात का?
कि स्त्रियां इतनी सम्पन्न हैं कि
मजदूरी तो करती होंगी इस शहर में
लेकिन उनके सिर पर छत है,
या फिर वो अकेले मजदूरी नहीं करतीं
इस शहर में, पुरुषों की तरह;
उनके लिए छत निश्चित करने वाला
कोई साथ है,
या इसका यह अर्थ है कि
सत्य यही है कि वो खुले आसमान के नीचे
ऐसे निश्चिंतता से सो नहीं सकतीं
फुटपाथ पर
क्योंकि वो केवल बेघर थकी हुई
मजदूर नहीं हैं,
वे स्त्रियां हैं
और फुटपाथ पर सो जाना
उनके लिए
एक बेहद डरावनी परिस्थिति है
क्योंकि वे स्त्रियां हैं।
By Dr. Madhulika Lakra

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