फिर से उठूंगी
By Khushbu Vandawat
वो समुद्र क्या जिसमें गहराई ना हो,
वो जीवन ही क्या जिसमें संघर्ष ना हो।
अगर गिरने का डर है तो शिखर तेरे लिए नहीं,
अगर मेहनत से डर है तो कामयाबी तेरे लिए नहीं।
हाँ, गिरी हूँ पर उतनी ही तेज़ी से उठूंगी,
हाँ, खा ली ठोकर पर अब संभलूंगी।
कलम अटकी थी मेरी, रूकी नहीं थी,
थक गई थी मैं, पर पीछे हटी नहीं थी।
काम मुश्किल है पर नामुमकिन नहीं,
सूर्यास्त होता है डूबने के लिए नहीं, नए दिन के लिए,
मैं गिरी थी हारने के लिए नहीं, संभलने के लिए।
ऊँची उड़ान भरनी है, सिर्फ फड़फड़ाना नहीं है,
थकना मंजूर है पर यहाँ रुकना नहीं है।
By Khushbu Vandawat

Good
Very meaningful and motivating poem showing the importance of hard work
Motibmvating
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nice poem