फिर भटक गए?
By Saksham Raj
देख कर लगता होगा नहीं उदास रहा करता हूं
सब में मौजूद हूं फिर भी तन्हाई सहा करता हूं
कहने को दो चार दोस्त हैं अब भी इस समंदर में
लेकिन खुदगर्ज़ मैं यूं अकेला ही बहा करता हूं
कई आए खुश करने और कई जा चुके
बेचैन सा रहा करता हूं सब पर बुझा करता हूं
किस्मत है मेरी वरना किसको जीत नहीं पाता
एक तुझसे हारा हूं तब से मरा मरा करता हूं
इस तन्हाई के दौर में सब मुख्तलिफ हैं मुझसे
सो मुख्तलिफ दौर में मैं ग़ज़लें कहा करता हूं
सोचता था कभी भटके हुए लोग कैसे रहा करते हैं
अब तंज हर किसी के क़ाबिल चखा करता हूं
By Saksham Raj

Definitely soul touching!
Lovely lines ❤️🩹
This piece holds a quiet elegance that’s hard to achieve.