फिर एक दिन सब ख़त्म हो गया
By Wamiq Zia
फिर एक दिन सब ख़त्म हो गया।
वो जज़्बों की जुंबिश, वो लफ़्ज़ों की वर्ज़िश
वो मुलाक़ातें, वो चाय पे होती बातें
वो सुरों की झनकार, वो गाति हुई मल्हार
वो बारहा रूठना, वो बिखरकर टूटना
फिर एक दिन सब ख़त्म हो गया।
वो आँसू पोछना, वो सम्हलकर टोकना
वो शामें, जो कभी बीती नहीं
वो नुमाइश जो कभी थी ही नहीं
वो ख़ौफ़ बिछड़ने का, वो वादा फिर मिलने का
फिर एक दिन सब ख़त्म हो गया।
वो नज़रों का धुंधलाना, वो अदाओं से इठलाना
साथ गुज़ारे सारे पल, तन्हाई बेकल बेकल
तेरे ख़तों पर बनते चेहरे, रातों के वो साए गहरे
दिल का तेरी आमद तकना, हर दम तेरी ख्वाहिश रखना
फिर एक दिन सब ख़त्म हो गया।
बातों पे तेरा वो मुस्काना, तन्हाई से घबराना
तेरा मेरी राह तकना, हाथों पर वो हाथ रखना
शहर की भीड़ में गुम होते थे
बिछड़ के फिर दिलभर रोते थे
फिर एक दिन सब ख़त्म हो गया।
तेरी हस्ती, दिल की बस्ती
तेरे सब ग़म, यादें बरहम
मलमल लहजा, फ़िक्रें बेजा
फिर एक दिन सब ख़त्म हो गया।
फिर एक दिन सब ख़त्म हो गया।
By Wamiq Zia

Comments