फर्ज़ सारे
Updated: Jul 16, 2025
By Kavita Batra

फर्ज़ सारे पूरे हुऐ ,
फिर भी ,कुछ अह्सास मेरे हिस्से के , अधूरे हूऐ।
किसी के लिए रुतबे की ज़रुरत हुऐ,
किसी के लिए पैसों की ज़रुरत हुऐ,
बेवजह, हम कमाल के ईस्तेमाल हुऐ ।
वक्त की ठोकर से जब हम बुलंदियों से गिरे ,
और जेसे ही अकेले हुऐ,
तब सारे अपने , खून के रिश्ते हमसे अनजान हुऐ ।
क्या खूब ईस्तेमाल हुऐ,
अपनों की भीड़ मैं,
हम बहुत सस्ते मैं नीलाम हुऐ ।
By Kavita Batra

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