फ़र्क
By Vaishali Shringi
हां, मुझे फ़र्क पड़ता है!!
क्या लिख दूं मैं कहानी अपनी,
सारा बचपन, सारी जवानी अपनी;
अच्छा, कौन करेगा भरोसा मुझ पर,
क्या तुम समझोगे कहानी मेरी..
चल है कौन तू, तेरा नाम बता
शहर कौनसा, चल पता बता
क्या तू कोई गांव से आई है
चल छोड़ सब, बस काम बता..
रंग कमाल है तेरा ये,
अगर सांवला भी होता, तो चलता मुझको..
वो क्या है, कि रंग गौरा बड़ा फबता है;
और सांवले पर, मन मचलता है..
फिर एक प्रश्न मन में उभरा मेरे,
मेरे रंग से क्यूं हैं इतने झमेले,
गौरा सांवला जो भी हो,
रंग तो दोनों ही हैं कितने अलबेले..
फिर बात आई मेरे कद पर सारी,
हुई मोटापे पर खत्म बेचारी,
जब सब कुछ कहकर दिलासा मिला,
ज़्यादा पतली भी नहीं अच्छी कुंवारी..
कभी रहने के ढंग सिखाए मुझे,
कभी बोली के रंग दिखलाए मुझे,
सब कुछ सीख अब भी कमी रह गई,
अरे ये ढंग क्या है कोई बतलाए मुझे..
इतना तेज नहीं ज़रा धीरे चलो,
बोली में तुम बस नरमी रखो,
ये क्या तरीका है कुछ कहने का,
जाओ पहले तुम तमीज़ सीखो..
अरे तुम बात नहीं सुनती हो,
बस सपनों में गुम रहती हो,
ख़ुद के आगे औरों को,
कहां इतनी तवज्जो देती हो..
कभी कहते हैं कमाना जरूरी है,
फिर मुझ पर लगाम जरूरी है,
अरे नहीं जानना सबका कहना,
मेरी भी राय जरूरी है..
यहां पग पग पर विचार बदलता है,
यहां हर जन को कुछ खलता है,
क्यूं इतनी राय है मुझको लेकर,
हां इन सबसे फ़र्क मुझे पड़ता है!!
By Vaishali Shringi

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