प्रेम या मोह
- Hashtag Kalakar
- Nov 30, 2025
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By Bhumika Haritwal
आज उसके वियोग में मेरी श्वाश घुट रही थी,
उसके अनुस्मरण में देह पीला पड़ रहा था,
पर हृदय ने प्रश्न किया --
यह व्याकुलता प्रेम की है, या केवल उसके मोह की?
तभी एक विचार हृदय में उतर आया --
मैंने कसकर मुट्ठी में रेत भरी,
देखा -- वह उंगलियों के बीच से फिसल रही थी।
जब मुट्ठी खोली,
वह रेत हथेली पर ठहर गयी।
मुझे समझ आया --
मेरा उसे झकड़े रहना मोह था,
मेरा उसे स्वीकारना, प्रेम।
उसी क्षण मैंने उसकी दी हुई गुलाब की पंखुड़ी,
जो वर्षों से मेरी डायरी में सजी थी,
मोह की आग की भट्टी में समर्पित कर दी।
अब शेष है केवल निस्वार्थ अनुराग,
जो न जकड़ता है, न जलता है --
बस शांत, स्थिर, और पूर्ण रहता है।
By Bhumika Haritwal

Great poem great use of metaphor of sand and the rose petal . Great work.