प्रेम की बात
- Hashtag Kalakar
- Dec 1, 2025
- 1 min read
By Akanksha Mishra
बहुत हुआ,
नहीं लिखूंगी अब कविता में,
कोई तेरी या मेरी बात,
करती हूं जो चांद से बातें,
या जो मिलती हूं तारों के साथ,
नहीं लिखूंगी,
बिना तुम्हारे कटती है कैसे हर रात,
किस रंग में मैंने तुमको देखा,
बैठी थी मैं किस फूल के साथ,
नहीं लिखूंगी,
बाग में कैसे हर काली से की थी तुम्हारी बात,
बहुत हुआ,
अब बहुत हुआ बिरहा के रंग में,
प्रेम भरे शब्दों का साथ,
लिखूंगी अब कुछ क्रांति-कारी,
कुछ देश, काल, जन मानस का,
हां हो लूंगी विद्रोही शब्दों के साथ।
पर प्रेम से बड़ी है क्रांति क्या?
है प्रेमी से बड़ा विद्रोही कौन?
है प्रेम नहीं किस देश, काल में?
है प्रेम नहीं किस मानस का?
हो द्वापर का कृष्ण प्रेम,
या त्रेता में राम की भक्ति हो
भगत सिंह का देश प्रेम हो,
या मीरा के प्रेम की शक्ति हो,
चाहे सूरज का उगना हो,
या लहरों की मस्ती हो,
चाहे फूलों का खिलना हो,
या झूम के मेघा बरसती हो,
है प्रेम नहीं किस कण में बोलो,
है प्रेम नहीं किस कण में बोलो,
हर प्रेम अश्रु गंगाजल है,
है भक्ति प्रेम की हर पुकार,
प्रेम स्वयं में क्रांति है,
प्रेम ही है जीवन का सार,
प्रेम को तुम में देखा है मैने,
तुमसे ही प्रेम को जाना है,
सौ बार स्वयं मैं तुमको देख,
मैने फिर ख़ुद को पहचाना है,
प्रेम नहीं लिखने बैठी थी,
पर हुई प्रेम की हाय सब बात,
जहां लिखूंगी ये शब्द प्रेम
वहां कैसे ना होगी तेरी बात,
वहां कैसे ना होगी तेरी बात।
By Akanksha Mishra

Beautiful
Atthaah prem ki abhivyakti..
👍👍
Too deep but presented with such clarity
Wah kya baat hai