प्रेम Aur न्याय
Updated: Oct 4, 2024
By Gautam Anand
मुझे प्रेम में
नदी होना चाहिए था
नहीं हो सका
ग़र हो पाता नदी
तो बहता अविरल, निर्बाध
तो होता जीवंत, मनोरम
बुझाता प्यास
मेरे तट पर
एक दूसरे का हाथ थाम कर
टहलते हुए प्रेमियों का
चलता समय के साथ
और बदलता स्वयं को
बदलती हुई परिस्थितियों के साथ
पर नहीं बदल सका स्वयं को
मैं ठहर गया, ठहरे हुए पानी की तरह
मुझे करना था न्याय
अपने प्रेम के साथ
इतना ज्यादा न्याय कि
स्वयं जीवन ही बौना हो गया प्रेम के समक्ष
मैं ख़ुश हूँ कि तुमने
प्रेम के मोहपाश से मुक्त किया स्वयं को
और न्याय किया अपने जीवन के साथ
कभी पढ़ो मेरी कविता को
तो बताना मुझे
जीवन को दाँव पर लगा कर
प्रेम के लिए न्याय की खोज
क्या सचमुच न्यायोचित है.....
By Gautam Anand

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