प्रेम
By Budhraj Singh Khinchi
प्रेम समष्टि के कण कण में है।
प्रेम समय के हर क्षण में है।
प्रेम समष्टि का आधार है।
प्रेम चराचर का व्यवहार है।
प्रेम ही प्रार्थना है, भक्ति है।
प्रेम ही निर्वाण है, मुक्ति है।
प्रेम ही जगत का कारण है।
प्रेम में ही समस्त निवारण है।
प्रेम से ही ब्रहाण्ड की सारी व्यवस्था है।
परमप्रेम हो जाना ही ईश्वर की अवस्था है।
प्रेम खोना है, ना पाना है।
प्रेम रोना है, ना गाना है।
प्रेम की कोई परिभाषा नहीं है।
अहसासों के सिवा प्रेम की कोई भाषा नहीं है।
वहाँ प्रेम नहीं जहाँ स्वार्थ है।
प्रेम तो परम परमार्थ है।
प्रेमविहीन हृदय ही पापी है।
प्रेमपूर्ण हृदय ही प्रतापी है।
प्रेम विहीन हृदय घातक है।
प्रेम विहीन हृदय ही पातक है।
प्रेम करो 'बुध' प्रेम ही सत, चित, आनन्द है।
प्रेम करो 'बुध' प्रेम ही परमानन्द है।
प्रेम करो 'बुध' प्रेम ही परमतत्व है।
प्रेम करो 'बुध' प्रेम ही ईश्वरत्व है।
प्रेम की दृष्टि किसी को भी परमेश्वर कर देती है।
क्या व्यक्ति, क्या वस्तु सबको ईश्वर कर देती है।
By Budhraj Singh Khinchi

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