प्रिय से मिलन
By Bhumika Haritwal
वो शीतऋतु की शीतलहर,
प्रिय के प्रेम का तप्त आभास देती है।
यह बात है प्रिय से मिलन की,
जो जकड़ती शीतलहर को उष्ण समीर में बदल देती है।
हम शहर के शिखर पर खड़े थे-
नीचे दीपो की झिलमिल,
उपर चाँद-तारों की टिमटिमाहट,
पर मुझे लगा,
सारी रोशनी तो प्रिय के नेत्रों में ही सिमट आयी है।
व्योम की छत के नीचे,
हमारी बाते बादलों-सी बहती रही,
फिर वह मुस्कराकर मुझे बाहों में भर लेता है-
और उस क्षण,
समय मानो श्वास लेना भूल गया।
उसने मेरे कानों में सपनों का गीत फुसफुसाया,
पर्वतो के उस पार की दुनिया की बातें की,
और जब विदा की बेला आई-
मैंने फिर उसे गले लगाया,
सर्द उंगलियाँ नर्म हो चली,
साँसें गहराई में उतर आई।
उसने जेब से रुमाल में बंधी काँच की चूड़ियाँ निकाली,
मेरी साड़ी का पल्लू संभाला,
झुमके टटोले,
और मेरे केशों में एक सफेद पुष्प सजा दिया।
इस बार हमने चाँद-तारों की नहीं,
एक दूसरे की आँखों की रोशनी को निहारा-
और उस आलिंगन में,
ऋतु रुक गयी,
प्रिय ठहर गया।
By Bhumika Haritwal

Comments