*प्रतिबिंब*
By Shobhana Thakur
विश्व-वेदना में झाँको तो, ख़ुद का प्रतिबिम्ब ही दिखता है,
सच पूछो तो यह युग हम-सा ही तो दिखता है..!
रणभूमि हो या रहवासी , लहूलुहान सब होता है,
एक रंग दिखाकर रोता है, दूजा अंतर मन में लहू का घूँट पीता है,
सच पूछो तो यह युग हम-सा ही तो दिखता है..!
कहीं यादों के स्तंभ बने, कहीं हीर-राँझा में क़सीदे बुने,
लिखकर जो सौ बार मिटाया, वह भी तो मस्त-मलंग बने।
एक सहज होकर सबमें मिल जाता है, दूजा असहज अर्थ भर रह जाता है,
सच पूछो तो यह युग हम-सा ही तो दिखता है..!
साधु, संत, संन्यासी युग छोड़ निरमोही बन जाता है,
भीड़ में बैठा एक सितारा, वह भी अकेले जीता है।
सच पूछो तो यह युग हम-सा ही तो दिखता है,
सच पूछो तो यह युग हम-सा ही तो दिखता है..!
By Shobhana Thakur

Superb
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