प्रकृति
By Ganesh Patel
हर रोज देखता हूँ
उगते सूरज को
गुनगुनी धुप को
फिर
बदन जलाती वाली
दोपहर की गर्मी को
फिर
ढल जाने वाली
मनमोहक शाम को /१/
कितना सिखलाती है
प्रकृति हमको
जन्म उत्थान और अंत का
प्राक्रतिक चलचित्र
फिर
चाँद का निकलना
खूबसूरत चांदनी
फिर
कभी कभी
न निकलना चाँद का /२/
बड़ी रहष्यमयी पाठशाला
है प्रकृति की
जो सुखद है उसमे केवल
आराम है ,विकाश नहीं
अकर्मण्यता है निरंतरता नहीं
वही जिसमे तेज है
झुलसा देनेवाली आग है
वही कर्मठ बनता है,
अकर्मण नहीं होने देता /३/
By Ganesh Patel

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