प्यासी अभिलाषा
By Dr C M Gupta Atal
कैसा न्याय हुआ करता है ईश्वर के दरबार में। मनचाही तो नहीं हुई इस क्षण भंगुर संसार में. खिलने को तो भांति भांति के कुसुम खिला करते हैं. मिलने को तो सुघड़ सलौने मीत मिला करते हैं. जो भव-निधि से पार उतरने की आशा तो करते हैं. जो जग में उपकार करत ही करत सदा मरते हैं. ऐसे प्राणी का दुख होता जो बिछुड़े मँझधार में. मनचाही तो नहीं हुई इस क्षण भंगुर संसार में। 1 कर्मों के अनुसार धरा पर जीव जन्म लेता है. कर्मों के अनुसार यहाँ पर सुख दुख को सहता है. जो लिख दिया विधाता ने कभी नहीं टल पाया। मानव की क्या चले राम को सिया विछोह सताया। जग की सच्ची देन अगर संतोष मिले उपहार में। मनचाही तो नहीं मिली इस क्षण भंगुर संसार में.2
आशाओं का महल बनाकर जीव यहाँ मुस्काता।
जब ढहता है दुर्ग सुहाना खड़ा खड़ा पछताता।
कैसी यह विचित्र माया है कोई वृच्छ लगाता।
फल चखने की कौन कहे छाया में बैठ न पाता।
तारे तोड़ गगन के लाता यदि होता अधिकार में।
मनचाही तो नहीं हुई इस क्षण भंगुर संसार में. 3
By Dr C M Gupta Atal

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