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प्यारी सहेली अखिला

By Bhanupriya


आशा करती हूँ तुम कुशल हो..खत की शुरुआत एक माफी से करना चाहूँगी की तुम्हारे पिछले 6 खतों के जवाब में बस लंबी चुप्पी भेजी तुम्हे..जीवन की उथल पुथल में इतना व्यस्त थी कि खुद को टटोल कर भी थोड़ा सा समय खुद के लिए निकाल पाने की कोशिश में निरंतर असफल हो रही थी..।

पिछले बीते 2 साल अत्यंत कठिन रहे मेरे लिए.. तुम तो खैर बेहतर परिचित हो मेरी असफल शादी और उसके बाद के जीवन के मेरे संघर्षों से। अक्सर सोचती हूँ कितनी आसान थी ज़िन्दगी बचपन में..बस क्लासवर्क और होमवर्क में निकल जाए करती थी। कब बड़े होगए हम दोनों.. और क्यों!! बचपन का समापन भी कितनी दुखद घटना होती है न.. आज भी याद है मुझे वो शुक्रवार जब हम दोनों कॉलेज के बाद फ़िल्म देख मेरे घर लौटे थे एक साथ। कितने खुश थे हम..घर आकर देखा विनीत और उसका परिवार ड्राइंग रूम के सोफे पर बैठा मुझे देख मंद मंद मुस्कुरा रहा था..मेरे रिश्ते के लिए आये थे वे सभी औऱ मेरे पिता ने अपनी सहमति जता दी थी...उसे एकाएक देख मुझे भी प्रसन्नता हूई मन ही मन..लड़का हैंडसम था..बिल्कुल किसी फिल्म के हीरो जैसा।। उसके परे तो फिर कुछ देखा सुना ही नही.. फ़िल्म सी लग रह थी दुनिया.. लेकिन फिर शादी हुई और कुछ ही दिनों में मेरे भ्रम को सच्चाई का धरातल मिला...

अब हर वक्त ये अपराधबोध सताता है कि क्यों मैंने उस दिन शरमा के हामी भर दी थी उस रिश्ते को.. उस एक निर्णय ने मेरे जीवन में अगिनत पीड़ाओं और ग्लानियों कि नींव रखी है.. कोई दिन नहीं जाता अब जब खुद को कोसती न होउ मैं अपने उस निर्णय के लिए.. शादी के बाद शुरुआती झगड़े जब हुए तो उनकी वजह समझ पाना मेरे समझ क्षेत्र से बाहर लगता था... मन किसी गहरे सदमे में था. रोज रोज के बेबात ताने और आक्षेपों ने दिल छन्नी कर दिया था.. फिर धीरे ये आम बात बन ने लगी...लगने लगा मानो सारी शादियां ऐसी ही होती होंगी.. हर दूसरे दिन के झगड़े और उनके परिणामों के रूप में मेरे चेहरे कमर और कलाई पर पड़े उसकी उंगलियों के निशान अब आत्मा को दागी करने लगें थे.. तब स्वयं को धीरे धीरे मैं अपने ही भीतर खोती जा रही थी..लोगों से ज्यादा खुद से बाते करने लगी थी.. सजीव इंसानो को छोड़ निर्जीव चीजों से बड़बड़ाना आदत बनता जा रहा था। सारा समय खुद से ये सवाल और उसके उत्तर में बीता देती थी कि आखिर मैं कहाँ गलत थी.. और तब तुमने समझाया मुझे की कभी कभी चीजें बस गलत हो जाती है हमारे साथ..। इसका अर्थ यह नही कि हम ही गलत थे। कर्मो का भुगतान हम या कोई भी इन्सान तय नही कर सकता...न ही इसे टाला जा सकता है..ऐसे खुद को कोसना और दोषी ठहराना ग़लत है। ओर मुझे भी तभी समझ आया कि खुद के साथ बुरा होते देखना, उसे चुपचाप सहना और अपने बचाव मे खड़ा न होना उतना ही गलत है जितना की किसी के साथ बुरा करना।औऱ वही पहली बार थी जब मैंने इन सबके विरोध में खुद के लिए आवाज़ उठाई। आज 2 साल के लंबे संघर्ष के बाद जब में आज़ाद हूँ तो वो इसलिये क्योंकि तुम थी मेरे साथ... अपनी सारी तकलीफों के बावजूद भी तुमने मेरा साथ कभी नही छोड़ा..

याद होगा तुम्हे जब मुझे पहली बार तुम्हारी मेडिकल कंडीशन के बारे में ज्ञात हुआ तो कितना मुश्किल था मेरे लिए उसे स्वीकारना। पैरों के नीचे से ज़मीन खिसकने जैसा था वो.. कितना रोइ थी तुमसे लिपटकर मैं..।। अखिला तुम मेरे लिए वो औषधि हो जो इस निर्दयी समाज के कड़वे कटाक्षों के दर्द को कम करने के लिए मुझे हमेशा चाहिये..तुम्हारे जीवन का ये सच मेरे लिए असहनीय था। और उस पल भी तुमने ही मुझे संभाला, मुझे सम्ब दिया के जीवन में विफलता तब तक हमारे पास नही मंडरा सकती जब तक स्वयं हम ही ने हार ना मान ली हो। हम लड़ते रहेंगे तो कुछ भी मुश्किल नहीं है। और तब मैं जान चुकी थी कि तुम एक योद्धा हो अखिला..मेरी योद्धा.. तुमसे ही मैंने अपने जीवन की लड़ाई को लड़ने और उसे जीतने की प्रेरणा पायी है। तुमसे ही जाना है कि हम दोनों ही अपने अपने जीवन मे कैंसर से झूझ रहे हैं। फर्क बस इतना है कि तुम्हारा कैंसर शरीर के भीतर एक अंग में है और मेरे जीवन का कैंसर एक जीता जागता इंसान हैं।। और ये कैंसर न बड़ा निर्दयी होता है। धीरे धीरे कब अंदर तक खोखला कर देता है भनक ही नही लगती। शुरुआत में छोटा सा फोड़े जैसा दिखता है।।लगता है समय के साथ ठीक हो जाएगा लेकिन जब तक इसके जानलेवा होने का पता चलता है ये हमारा एक बड़ा हिस्सा खा चुका होता है। फिर चाहे वो किसी अंग का हिस्सा हो अथवा जीवन का। इसको हराना है तो इसकी ख़िलाफ़त में आवाज़ उठानी ही होगी। तुमसे ही मैंने अपने इस कैंसर को हराने का हुनर सीखा है।



मैं अक्सर कहती थी के मुझे जीवन मे बस इस बात का मलाल रहेगा कि मुझे सच्चा प्रेम नहीं मिला। वही जैसा किताबों में पढ़ा था जैसा फिल्मो में देखा था हमने। में कितना चाहती थी वो सब महसूस करना... चाहे कुछ दिन या महीने के लिए ही सही पर मुझे एक बार बस गुजरना था उस प्रेम गली से जहाँ सब कुछ इंद्रधनुष जैसा रंगीन हो , जहाँ दिन और रात का फर्क महसूस न हो, जहां भूख प्यास सुध सब कुछ दूसरी सीढ़ी पर आता हो और पहली सीढ़ी पर आता हो अप्रतिम प्रेम.. पर अब समझ चुकी हूं कि बचपना ही था वो मेरा, जो नहीं था उसकी कल्पना और चाहत में मैं इतनी व्यस्त हो गई थी के जो साक्षात मेरे सामने था उसे कभी देख ही नहीं पाई। क्योंकि अब जब मैं तुम्हारे-मेरे बारे में सोचती हूँ तो लगता है कि किताबो और फिल्मों वाला प्रेम तो मैं निसंदेह न पा सकी लेकिन तुमसे ये जो अथाह और निर्विवाद प्रेम मिला ये स्वयं में ही कितनी किताबों की भूमिका बन सकता है। तुमने मुझे तब संबल दिया जब मैं स्वयं खुद के लिए खड़ा होने में हिचकिचा रही थी। तुमने अपनी लड़ाई लड़ते हुए भी मुझे मेरे जीवन के संघर्षों में कभी अकेला नही छोड़ा। तुम मेरे लिए एक योद्धा हो और सदैव रहोगी। जिसने मुझे स्वयं में विश्वास करना सिखाया, जिसने अपनी इस जंग में न सिर्फ मुझे लड़ने बल्कि जीतने के लिए प्रेरित किया। तुम्हारे मेरे बीच के ईस अनजान अनकहे अबोले प्रेम की सारी ही गिरहें मुझे अनमोल है..


By Bhanupriya




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