प्यार, रिश्ते और एक आस
By Ankita Pradeep
एक लौ जली है अब भी
दिल भरा है लेकिन एक आस बची है अब भी
आहें तो हैं दिल में कई
लेकिन अब कहने - सुनने को शायद कुछ बचा ही नहीं
दुखी वो भी हैं और दुखी हम भी
लेकिन चाहत के आगे तो और कुछ भी नहीं
चाहते हैं अब भी, एक दूसरे को खुश भी देखना चाहते हैं
अलग रहकर खुश रह तो नहीं सकते
लेकिन एक दूसरे के लिए खुश रहने के अलावा कोई चारा भी नहीं
मुश्किलें सुलझा सकते थे
कुछ रास्ता निकाल आगे बढ़ सकते थे
लेकिन वो उलझ के रह गए
रिश्तों के दर से खुद ही को कोसते रह गए
हम नए दुनिया के इस रिश्तों खेल में
इससे पहले के यह समझते, हम हार गए
हार गए तो हार ही मान ली उन्होंने
हार गए तो उठकर चलना और जीतना भी था
मगर राहें ही बदल ली कहीं मझधार में
गलतियां कुछ हमने की, कुछ उनसे हुईं
लेकिन उनसे सीख उन्हें सुधारना भी था
हमे मिलकर आगे बढ़ना और साथ जीना भी था
एक मंजिल में साथ कैसे निभाएंगे यह देखना था
उतार - चढ़ाव, रोना - हस्ना तो मौसम हैं ज़िन्दगी के
हर मौसम घोंसला कैसे बनाते हैं
जीवन का यह हुनर भी सीखना था
लेकिन एक ही मौसम की आंधी से तिनके बिखर गए
हमारा घर जो अनमोल था उसके सपने भी छुटने लग गए
बाकी रिश्ते बचाते बचाते
हमारे अनमोल तिनके चूट गए
और हम सावन आने से पहले ही यूं पतझड़ में टूट गए
लेकिन एक लौ अब भी है, एक आस अब भी है
पतझड़ के बाद जो समय है उसमें सावन की हरियाली और खुशियों के आने का इंतज़ार अब भी है।
By Ankita Pradeep

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