पेड़ों की खामोश जुबां........
By Harshal Garg
वो पेड़ों की खामोश जुबां की बात,
जो बयां नहीं कभी उस एहसास की बात,
जिन पंछियों का ना लौटना सवाल ही था,
कैसे भूले उन्हें जिनका घर वो डाल ही था,
उनके ना लौटने का डर सताता ही होगा,
सब कुछ याद आता ही होगा।
वो उड़ता कारवाँ जो घर लौट के आया नहीं,
साँझ होने को आयी क्या उन्हें किसी ने बताया नहीं,
वो डालियों पर मधुर चहचहाहट की आवाज,
वो पंछी के बच्चे के पहले उड़ान का आगाज,
वो दृश्य मन को तब भाता ही होगा,
सब कुछ याद आता ही होगा।
पेड़ों पर वो घोंसले अब दिखते ही नहीं,
बरसात में अब वो चहचहाहट सुनते ही नहीं,
पेड़ की छाँव में नए कोई सपने बुनते ही नहीं,
बच्चे भी अब टहनियों से फल चुनते ही नहीं,
पंछी बिना पेड़ का हर फूल मुरझाता ही होगा,
सब कुछ याद आता ही होगा।
छत पर भी अब कोई चिड़िया आती ही नहीं,
अपनी मीठी आवाज में अब चहचहाती ही नहीं,
अपने घरोंदे यूँ छोड़कर उड़ गए वो गगन में,
इंसान भूल गया उन्हें अपनी तकनीकी के मगन में,
माली भी पेड़ को सब कुछ समझाता ही होगा,
फ़िर भी सब कुछ याद आता ही होगा।
By Harshal Garg

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