पूर्व छात्र पुनर्मिलन
By Hari Mohan Saxena
विद्यालय को छोड़े मुझको
वर्ष हो गए अर्धशतक,
फिर भी ना जाने क्यों लगता
क्षण में बीते वर्ष विगत।
कल की सी ही बात है लगती,
पुनः जोश की आग धधकती,
नभ को मुट्ठी में लेने की
वही पुरानी चाह सुलगती।
सपनों और उमंगों की,
अभिलाषा कुछ करने की,
जिज्ञासाएँ जग भर की
जन्मी यहीं, यहीं पलती थीं।
भोलापन और बचकानापन
गया कहीं और आया यौवन,
पहला प्रेम यहीं पा करके
खोया चैन समूचे जीवन।
स्नेह शिक्षकों का पाकर हम
कर पाए कुछ विद्या अर्जन,
उनकी डांट डपट सहकर ही
सीख सके हम कुछ अनुशासन।
सहपाठी और सखा हमारे
मनोरंजन के साथी न्यारे,
सीखा उनसे जीवन जीना
एक दूजे के बने सहारे।
आज पुनः आकर इस प्रांगण
भीगी आँखें, व्याकुल है मन,
जीवन का स्वर्णिम युग था वह
अब लगता है सपना था वह।
बीता समय नहीं आता पर
उसकी याद हमेशा आती,
सुधियाँ ही हैं जीवन में अब
पूंजी यही, यही है थाथी।
नींव सुनहरे जीवन की
हमने रख दी इस माटी में,
जो बीज रखे संस्कारों के
कुसुमित हो फले प्रयासों से।
मेरा निश्चय कुछ कर जाऊं
शिक्षा के ऋण को चुकताऊँ,
मानव के हित का साधन बनकर
जीवन अपना सफल बनाऊं।
By Hari Mohan Saxena

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Beautful peom
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