पुस्तक की व्यथा
Updated: Dec 2, 2022
By Saurav Suman , Pen Name -- Shadow
अरे ओ भाईसाहब, यूं ही घुरते रहोगे या अपने चंचल चित को शांत कर कभी मेरी ओर भी अपना ध्यान बढ़ाओगे ?........
यह सब सुनकर मैं चौक उठा कि आखिर निर्जीव पड़े इस कमरे में ये जीवन्त ध्वनि किसकी थी ?...
मैंने कमरे की चारो दिशाओं में अपनी दृष्टि दौड़ाई, पर समझ ना आया कि आखिर ये आवाज लगाई किसने है भाई ?... फिर मेरा ध्यान मेज पर पड़े एक पुस्तक की ओर जाता है.........
मैं हूं, अरे हां भाई मैं ही हूं.....( पुस्तक दुखी स्वर मे) रोज तुम मुझे अपने बस्ते से उठा कर मेज पर रख देते हो और घंटो अपनी कल्पनाओ में लीन रहते हो, क्या तुमने कभी मेरी अपयोगिता के बारे में सोचा है या यूं ही दूर से मेरी सार्थकता का अनुमान लगाते हो...
" मुझे विश्वास न हुआ की आखिर एक बेजान पड़ी बेजुबान किताब भी बोल सकती है ".........
( पुस्तक अपनी नारजगी ज़ाहिर करते हुए ) "अरे भाई, इतने चकित क्यों हो ?" तुम्हारा मेरे प्रति अनादर और असतता के भाव ने ही मुझे बोलने पर
विवश कर दिया है.....
जब देखो तुम अपनी ही दुनिया में खोए रहते हो, कभी कान खूजाते हो, कभी इधर उधर देखते हो तो कभी न जाने किसके ख्यालों में खोए रहते हो और जैसे ही तुम्हारी माँ कमरे में आती है वैसे ही तुम मुझे खोलकर बैठे जाते हो पर पढते एक अक्षर भी नहीं हो.......
और ना जाने कैसा टोना किया है तुम्हारे फोन ने, उससे तुम्हारी नजर हटती ही नहीं मानो वो तुम्हारी प्रेमिका हो.... उसे देखकर कभी तुम हँसते हो, कभी गुनगुनाते हो तो कभी थिरकने लगते हो और ना जाने कैसी कैसी विचित्र हरकतें करते हो ... तुम्हे अपने भविष्य की चिंता है भी या नहीं...........
( मैं बड़े ही लापरवाह एवं हास्यास्पद मिजाज में).... एक तो तुम निर्जीव हो, ऊपर से मुझे मेरे भविष्य का भाषण देते हो। क्या तुम्हें पता है कि मेरे मुख्य परीक्षा के बाद तुम्हारा भविष्य क्या है ?..
मैं बताता हूं, तब तुम्हारा भविष्य और नियति यह महल नहीं बल्कि कबाड़खाना होगा. तो अपना मुख बंद करो और बिना किसी हरकत के अपने किताबी ज्ञान के साथ उस मेज पर पड़े रहो.........
इसके बाद, किताब ने जिस भावुक्ता से
अपना रोश प्रकट करना शुरू किया मैं निस्तब्ध होकर अपनी कुर्सी पर बैठे हुए उसे एकटक देखता रहा........
(काव्य शैली में)
"मैं अनंत हूँ , मैं विशाल हूँ,
ज्ञान, बुद्धि का मैं भंडार हूँ I
माँ सरस्वती की वाणी मैं
ऋषियों की संतान हूँ.......
भूत का मैं ज्ञाता,वर्तामान का वरदान हूँ
मेरी निंदा करता है तू ,
मैं भविष्य का ब्रह्माण्ड हूँ .......
ज्ञानियों का मित्र मैं, अज्ञानी शत्रु मानते है ,
जिसको कहा निर्जीव तुने उसके समक्ष,
देवता भी शीश झुकाते हैं "........
यह सुन मेरे रौंगटे खड़े हो गए, मेरे चेहरे का भाव स्थिर हो गया। कमरे में इतनी शांति हो गई कि सन्नाटे को चिरती हुई टर-टर करते झिंगुर की आवाज भी कहीं खामोशी में गुम हो गई I मैं बेमुख था, और ऐसी परिस्थिती में मैंने मौन रहना ही बेहतर समझा I आत्मागलानी से मैंने अपनी आंखें बंद कर ली......
ज्यो ही मैंने आंखें बंद की मुझे घर के घंटी की बजने की आवाज सुनाई देती है. कुर्सी से उठ दरवाजे की ओर जाने के लिए जैसे ही मैं अपनी आंखें खोलता हूँ खुद को अपने बिस्तर पर आंखें मिचता हुआ पाता हूँ I मैं भौंचक्का रह गया मगर कुछ पल बाद यह एहसास हुआ की ये सारी बातें एक स्वप्नमात्र थी......
गहरी सांस लेकर, चादर तानकर मैं जैसे ही सोने के लिए अपनी पलके झुकाता हूँ मेज की तरफ से एक आवाज आती है.........
" उठ जा मुर्ख, सुबह हो गई"..........
By Saurav Suman , Pen Name -- Shadow

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