पुरुषार्थ की कथा
Updated: Dec 22, 2023
By Yogesh Kumar Pradhan
एक विगत काल की बात हुई
खुद की निज मन से मात हुई,
यह बात एक हलधर की है,
उसके श्रम भाव सादर की है,
वह सदा हर्षित नजर आता था,
पर कुछ उसपे वाम विधाता था।
वह अपने कार्य में सक्षम था
पर फलहीन सदा उसका श्रम था।
एक दिन जाने क्या रात हुई,
उसकी कुछ खुदसे बात हुई -
निष्ठा से करम मैं करता हूं,
अनिंदित परिश्रम करता हूं,
पर व्यर्थ मेरा श्रम जाता है
फल नही मुझे मिल पाता है,
थक चुका हूं अब क्या काम करूं,
सब त्याग तनिक विराम धरूं,
मन उसका कुछ चिंता में था,
कुछ सोच समझ फिर खुद से कहा-
थक गया है तो आराम कर,
विराम नहीं,विश्राम कर।
फिर उठ कुछ नया उत्साह जगा,
अंतर्मन की आवाज जगा।
श्रम व्यर्थ गया तो व्यर्थ सही,
फल आज नही तो और कभी,
अविरत श्रम तू करता जाएगा,
विधाता कब तक वाम रह पाएगा।
By Yogesh Kumar Pradhan

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