पिताजी
By PRATEEK SAINI
मुझे आज भी याद हैं वो किस्से जो वो सुनाते हैं
कैसे दो आने की कीमत लाखों से समझाते हैं
हर महीने तनख्वाह का आज भी हिसाब लगाते हैं
बचत की बातों में कुछ ज़्यादा बतलाते हैं
पिता के किरदार में बेशक थोड़े सख्त से हैं
मैं खुश हूं बस ये देखकर कि वो खैरियत से हैं
दिन भर के समाचार पूरे घर को सुनाते हैं
एक बार महंगाई की दुहाई ज़रूर दोहराते हैं
हमारी तरक्की देख गर्व से चौड़ा जाते हैं
कमरे की हर चीज़ की एक जगह बताते हैं
हमारी बेसलीका ज़िंदगी के लिये उदाहरण से हैं
मैं खुश हूं बस ये देखकर कि वो खैरियत से हैं
कुछ सोचते ज़रूर हैं जो कभी बतलाते नहीं
कुछ मन की बाते हैं जो कभी समझाते नहीं
हां कुछ बाते हैं कभी कभी फुसफुसा लेते हैं
गहरी बातें बोल कर झट से मुस्कुरा लेते हैं
झुर्रियों पर मुस्कान है पर कुछ गंभीरियत से हैं
मैं खुश हूं बस ये देखकर कि वो खैरियत से हैं
कपड़ों की इस्त्री से रोज़ वही समय दोहराते हैं
खाली हैं पर हर दिन दफ्तर सा बिताते हैं
बालों की काली कलम से उम्र को चिढ़ाते हैं
ज़िम्मेदार थे कभी अब बच्चों से बन जाते हैं
आज फिर इंतज़ार करते होंगे वो मेरे आने की
उम्रभर की बातें कोशिश करेंगे बताने की
पर शायद अब कुछ कहने को मन नहीं करता होगा
बूढ़ी आखों में वो जोश शायद जमता नहीं होगा
हां मानता हूं मेरी ज़िंदगी के बूढ़े हीरो से हैं
मैं खुश हूं बस ये देखकर कि वो खैरियत से हैं
By PRATEEK SAINI

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