पापा या मम्मी
- Hashtag Kalakar
- Nov 29, 2025
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By Anup Kumar Jaiswal
यह कितना अजीब सा सवाल था जब कक्षा 5 में मेरी कक्षा अध्यापिका ने सभी बच्चों से यह पूछा कि घर का मुखिया कौन होता है, कौन बच्चों को सबसे ज्यादा प्यार करता है और घर को संभालने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका कौन निभाता है? हम सभी बच्चों ने हँसते - मुस्कुराते अपना - अपना हाथ उठाया और जवाब भी सबों के लगभग एक जैसे ही थे कि घर का मुखिया तो पिताश्री ही होंगे क्यूंकि जब भी मुंह खोलो कुछ न कुछ मिल ही जाता है, और सीधी सी बात है कि माँ से ज्यादा प्यार भला कौन कर सकता है आखिर हमारी नखड़ों को जो सर पर उठाए रखती हैं लेकिन तीसरी सवाल का जवाब थोड़ा मुश्किल तो था फिर भी जवाब में बहुमत माताश्री जी को ही मिला।
दिन गुजरते गए और न जाने कितनी ही मौसमों और ऋतुओं को हमने बदलते भी देखा कि देखते ही देखते हम सब ना जाने कब सयान हो गए। कॉलेज के दिन शुरू हो गए थे और तो और अब अपनी जरूरतों को भुलाने भी लग गए थे क्यूंकि घर की जरूरतों को समझने जो लग गए थे। फिर एक दिन ऐसा आया जब जिस आत्मसम्मान के साथ हम जी रहे थे उसे पिताजी ने यह कहकर पल भर में चकनाचूर कर दिया कि अब तुम बड़े हो गए हो, 12वीं पास कर चुके हो, अपना खर्च उठाना सीखो और घर की जरूरतों में भी हाथ बंटाया करो।
तब शायद मैं 16 या 17 साल का रहा होऊंगा और सच में नौकरी की तलाश शुरू कर दी, छोटा मोटा काम भी मिल गया, काम भी करने लगा और घर की जरूरतों में भी हाथ बंटाने लग गया। अब सब कुछ ठीक चल रहा था कि अचानक किसी की प्यार भरी और जख्मी नज़र मुझ पर पड़ गयी और फिर एक दिन मैं उनका शिकार बन गया या यूँ कहें कि जिम्मेदारियों को समझने से पहले ही मेरे सिर पर जिम्मेदारी का बोझ आ पड़ा था, कि अब मेरी शादी हो गयी थी।
समय के साथ - साथ हम भी आगे चलते गए, अब खुद का परिवार हो गया तो स्वाभाविक है कि खर्च बढ़ने लग गए अतः आगे की पढ़ाई भी शुरू की और काम भी करता रहा ताकि काम में कुछ तरक्की मिले, आमदनी बढ़े ताकि परिवार को संवार सकूं क्यूंकि मैं मेरे पिताश्री की वो बात अब भी नहीं भूला था जब उन्होंने पढ़ाई पूरी होने से पहले ही हमें काम करने और जिम्मेदारी उठाने का सबक सिखा दिया था। वैसे बात बुरी नहीं थी लेकिन मुझे यह सोचने पर अवश्य ही मजबूर कर दिया था कि मैं मेरे बच्चों को तब तक अवश्य पढ़ाउंगा जब तक कि वो स्वयं से अपने साकार होते सपनों का जिक्र मुझसे न करें अर्थात मुझसे आकर यह न कह दें कि पापा मुझे अब नौकरी मिल गयी है और कल मेरा पहला दिन है, आशीर्वाद दें।
वक्त का पहिया घूमता रहा और समय के साथ मुझे पापा बनने का भी सौभाग्य प्राप्त हुआ, मेरी पत्नी ने मुझे दो खूबसूरत बच्चे मुझे उपहार में दिए। अब तक मैं भी स्नातक की डिग्री ले चूका था, नौकरी में भी तरक्की हो गयी थी, आमदनी भी पहले से बेहतर हो चली थी और बच्चों के साथ खेलते - खेलते दिन भी आराम से गुजरने लग गए थे। समयानुसार बच्चों की पढ़ाई भी शुरू हो गई और इसमें कोई संदेह नहीं कि मेरे बच्चों का प्रदर्शन हमेशा उत्कृष्ट रहा, जिसके कारण मेरा मन भी अपनी निजी जिंदगी को छोड़कर उनकी पढ़ाई और उनकी जरूरतों की ओर झुका रहा।
हांलाकि जीवन में कई बार उतार - चढाव का मंजर भी देखना पड़ा लेकिन सब कुछ ठीक ही चल रहा था कि फिर अचानक मेरी पत्नी गंभीर बीमारी का शिकार हो गई, कुछ दिनों बाद शहर में लॉकडाउन लग गया, कंपनी ने सैलरी बंद कर दी, बिल्डर घर के कागज दिए बिना भाग गया और तो और, एक करीबी दोस्त तो 20 लाख रुपये भी लेकर चंपत हो गया। ये वो वक़्त था जब मैं अपनी तकलीफ किसी से साझा भी नहीं कर पा रहा था या यूँ कहें तो शरीर में अब खून नहीं सिर्फ पानी ही रह गया था और चुनौतियां ऐसी कि एक तरफ पत्नी का इलाज, बच्चों की पढ़ाई का खर्च, डूबे हुए पैसों का बैंकों से रिकवरी एजेंट का घर का दौरा और देखते ही देखते एक दिन मैं दिवालिया हो गया, और अब तो शायद मेरी आँखों में उमड़ते आँसू भी खुद को अपमानित महसूस करने लग गए थे लेकिन फिर भी चुनौतियां कम नहीं हुई।
आखिर चुनौतियाँ कम होतीं भी तो कैसे, मुझे मेरी पत्नी का इलाज़ करवाना ही था, बच्चों को अच्छी शिक्षा देने का प्रण जो किया था तो उनका खर्च भी वहन करना ही था, बैंक का कर्ज़ भी धीरे - धीरे चुकाना ही था और सबसे बड़ी बात ये थी कि जैसे - जैसे मेरी ज़रूरतें बढ़ती गईं यानि मैं और भी तक़लीफ़ों में घिरता गया, मेरे रिश्तेदार भी मुझसे दूरियाँ बढ़ाते चले। मैंने कंपनी में थोड़ी तनख्वाह बढ़ाने के लिए आवेदन किया तो मेरी आवेदन को यह कहकर खारिज कर दिया गया कि आप पहले से ही बहुत महंगे कर्मचारी हैं, अगर कंपनी चाहे तो उतना ही कीमत पर दो कर्मचारी रख सकती है। ऐसे में शायद यही कहना उचित होगा कि जब तक दरवाजे पर मेरे दीपक जल रहे थे, तब तक सारा संसार प्रकाश से जगमगा रहा था और आज मेरे दीपक की रौशनी धूमिल क्या हुई, ऐसा लग रहा है जैसे पूरे संसार पर ग्रहण सा लग गया है।
अर्थात एक तरफ खायी थी तो दूसरी तरफ गहरा कुंआ, यानी कि न तो मैं जी पा रहा था (जीने के लिए भी तो सैकड़ों चुनौतियों का सामना करना था) और न ही मरना आसान रहा था (आखिर मेरे बाद मेरी बीमार पत्नी और मेरे अपरिपक्व बच्चों को भला कौन देखता, उनका भविष्य क्या रह जाता), और तब जब मेरी डूबती हुई जिंदगी को एक तिनके सी सहारे की जरुरत थी यानि जिंदगी की आखिरी उम्मीद, मेरे अपने सगे, खून के रिश्ते, मेरे माता - पिता के साथ - साथ भाई और बहन भी मुझे इस क़दर दरकिनार किया जैसे मुझे पहचानते ही नहीं या फिर न जाने कितनी जन्मों के बैरी रहे हों हम।
फिर मैंने जीवन का एक बहुत ही कठोर और निर्मम फैसला लिया जिसने मुझे हिम्मत दी और वो फैसला यह था कि मैंने खुद को एक सर्वश्रेष्ठ पिता और सर्वश्रेष्ठ पति साबित करने की कसम खायी थी; हालाँकि मैं आज भी हर दिन मर मर कर जीता हूँ, अपने और अपने परिवार के एक एक पल की ख़ुशी के लिए संघर्ष करता हूँ, और उस दिन की प्रतीक्षा करता हूँ जब लोग मेरे बच्चों को मेरे नाम से नहीं बल्कि मुझे मेरे बच्चों के नाम से जानें। अर्थात एक पिता जो अपने जीवन का सब कुछ अपनी पत्नी और अपने बच्चों के बेहतर जीवन और ख़ुशी के लिए न्यवछावर कर देता है, क्या उससे भी बेहतर, जिम्मेदार और आदरणीय इंसान इस दुनिया में कोई हो सकता है?
आज मुझे अपनी उसी कक्षा 5 की कक्षा अध्यापिका के तीसरे प्रश्न का उत्तर भी मिल गया था। इसमें कोई संदेह नहीं है कि माताएं महान होती हैं और वे अपना सर्वस्व देकर अपने घर का पालन-पोषण करती हैं, एक नया दिशा देती हैं, लेकिन एक घर पिता के बिना अवश्य ही अधूरा होता है जो परिवार को सफल, मजबूत और खुशहाल बनाने के लिए जीवन भर अपने पसीने से अपने घर को सींचता रहता है, परिवार का पालन-पोषण करता है और न जाने कितने दुखों और दर्दों को अपने सीने में दफ़न कर अपनी पत्नी और अपने बच्चों की भलाई के लिए अपना सर्वश्रेष्ठ देता है।
चलते चलते दो शब्दों में……
माँ तो माँ ही रहेगी जग में कि उनको पूजना अनिवार्य है,
मगर पापा की भूमिका भी तो हर बच्चे का श्रृंगार है।
माँ देती हैं असीम दुलार पढाती ममत्व और संस्कार है,
पापा थोड़े कठोर सही मगर सफल जीवन के आधार हैं।
By Anup Kumar Jaiswal

Very beautifully written!!
Very beautifully written!!
Very touch of ❤️ ❤️ ❤️
हृदयस्पर्शी
It's very nice and touching to heart.