पहेली
Updated: Oct 10, 2022
By Sakshi Begwani
भीड़ भरी इस दुनिया में
रोज हजारों से मिलता हूं
खुद के इन नए चहरों से
मैं बहुत डरता हूं
हर इंसान एक पहेली है
यह बात में समझता हूं
पर वो पहेली जो मुझमें है
उससे रोज उलझता हूं
कभी मिठाई की तरह मीठा
कभी नीम जैसा हो जाता हूं
कभी सबको आदर देता
कभी गुस्सैल बन जाता हूं
कभी कभी बहुत शांत मैं
तो कभी बहुत बतियाता हूं
कभी रोता हूं बहुत
तो कभी बहुत मुस्कुराता हूं
किसी से करता हूं मैं नफरत
तो किसी से प्यार जताता हूं
किसी के सुनता हूं ताने
तो किसी को खूब सुनाता हूं
किसी को रखता हूं दिलमे
तो किसी को राख समझता हूं
किसी किसी को हसाता
तो किसी को बहुत रुलाता हूं
आपने इतने रूप देखकर
सवालों से घिर जाता हूं
इंसान हूं मैं गिरगिट नही
फिर भी कितने रंग दिखाता हूं
समय और परिस्थिति के भय से
इन चहरों का बोझ उठता हूं
चेहरा कोनसा है असली
इसी पहेली में उलझा रहता हूं
इसी पहेली में उलझा रहता हूं
By Sakshi Begwani

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