पहली चुप्पी
By Harshita Shrimali
कितनी ही अनकही बातें, अनकही ही रह गई,
लबों पर आने से ही, ऐतराज़ कर गई।
जाने क्यूं ये खता, मुझे मेरी लगती हैं,
दिल भरा सा है फिर भी, कोई बात इसे खाली कर गई।
लम्हे जो गुजरे थे उन्हें, संजो कर रखा था मैंने,
पर कुछ यादें उन लम्हों में, चुभन सी कर गई।
एक ही रिश्ता है, जो बेशकीमती लगता था,
जाने क्या हुआ, कोई नजर सी लग गई।
खुशी और गम की उनसे, बातें किया करते थे,
अनजाने में हुई खताओं की, सज़ा बड़ी मिल गई।
जीवन के हर मोड पर, तुम्हे ही अपना समझा,
कोशिशें हज़ार की लेकिन, कमी मुझसे ही रह गई।
By Harshita Shrimali

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