पर्दे का नकाब
By Abhishek Choudhary
चेहरे के आधे फर्श पर पर्दे का नकाब है
उसमें दिखती आंखें जैसे आंख नहीं कोई ख्वाब है
ख्वाब है जैसे गहरा सागर जिसमें हम चलते ही जाएं
फिर होना उनका नज़राना, वो पल बेहिसाब है ।
तिरछी कातिलाना नज़रें, नज़र नहीं शमशीर है
इनको पाना मेरी हसरत, ये मेरी जागीर है
इनपर जो पलकों का घेरा, कितनी जान बचाए है
इनसे ही बचकर गुजरे कई मरजाने दिलगीर है ।
और वो आंखें शर्माई सी घुंघराले बालों में छिपकर
फिर होंठों से लफ्ज़ बिखेरे इस दिल का हर तार बजाकर
हम मरजाने मर जाते है कितना भी नज़रों से बच लें
एक ही लफ्ज़ है काफी फिर तो जो आए मुस्कान लुटाकर।
एक नकाब जो हुस्न छुपाकर कितनों को बहलाए हुए है
कितनी आंखों को तरसाकर कितने दिलों को सताए हुए है
दिये से जल उठते है जब कोई इश्क के अंधियारे में जाए
हमको भी अब इश्क हुआ है हम भी वही लौ जलाए हुए है।
By Abhishek Choudhary

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