परिचय
By धनंजय प्रताप शर्मा
एक कलम में दो स्याही कैसे लाऊं,
देशप्रेम और रुपप्रेम का अंतर कैसे गढ़ पाऊं,
मैं लिखूं हिंद का सार, शीत की ब्यार और उमड़ घुमड़ते
मेघ लिखूं,
या प्रेम युगल का प्यार, लाल कपाल और रूप से मीत
लिखूं,
मैं लिखूं टंकार धनुष रघुबर की और जरासंघ दो फ़ाड़
लिखूं,
या फूलों की क्यार और महलों का श्रृंगार लिखूं,
मैं लिखूं वो खूनी फाग़ या दावानल की आग लिखूं,
या मदिरा में मदहोश वो घुंगरू की झंकार लिखूं,
मैं लिखूं गरजते मेघ, सूर्य का तेज और गंगा का वेघ
लिखूं,
या प्रेम भरा गुणगान और मखमल का परिधान लिखूं,
मैं लिखूं खड़ग की मार, रक्त की धार और राष्ट्र से प्रेम
लिखूं,
या प्रेम लगन की राग और यथा कथित विश्वास लिखूं,
मैं शब्दों की चिनगारी से, शत्रु की चिता जलाता हूं,
मैं भारत को ही लिखता हूं, मैं भारत को ही गाता हूं,
मैं अमर भारत की वेदी पर, बलिदानों के रक्त दिखाता
हूं,
मैं जलियांवाला गाता हूं, महारानी झांसी याद दिलाता
हूं,
मैं अखंड राष्ट्र की सोच लिखूं और लिखूं राष्ट्र का मान,
मैं राष्ट्र से प्रेम लिखूं तर्षित के नीर समान,
मैं घर के भेदी को भी, सच्चा दर्पण दिखलाता हूं,
तीन रंग की आभा से, मैं श्वेत कफन ठुकराता हूं,
मैं शब्दों की चिनगारी से, शत्रु की चिता जलाता हूं,
मैं भारत को ही लिखता हूं, मैं भारत को ही गाता हूं,
By धनंजय प्रताप शर्मा

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