परिंदा
By Smita Chaudhary
परिंदा सा उड़ता है
मन आज भी और
जाके बैठ जाता है
मुंडेर पे मयके की
जहां
बचपन की यादों में
फुदकता रहता है कभी
बाबा का प्यार
और
माँ की नसीहते कभी
भाई बहनों से शरारतें
ओर जो नही है
उनके जाने के गम मे
आँखे भिगो देता है मन
क्या करूँ
परिंदा ही तो है!
By Smita Chaudhary

👌🏻👌🏻
👌🏻👌🏻