" परिंदा "
Updated: Oct 1, 2024
By Rashmi Dadhich
जीने का अलग ही अंदाज पाया
उस नन्हे परिंदे ने मुझको सिखाया
कल शाम वो मेरी बालकनी में आया।
उसकी खूबसूरती मेरे मन को भाई,
उसे देख मन ही मन मैं मुस्कुराई
ए काश ता-उम्र उसे साथ रख लूं,
ये सोच चुपके से पिंजरा ले आई।
तभी उस परिंदे से आवाज आई,
मैं सहमी, थमी, जरा हिचकी चाई,
बेखौफ बेबाक वो मुझसे बोला-
जानता हूँ मुझे कैद करने हो आई??
बेड़ियों से जकडी है तेरी मोहब्बत,
इंसान हो तुम ये तुम्हारी है फितरत,
खुदगर्ज है तेरी परवरिश भी,
अगर बस चले कैद कर लो तुम कुदरत।
हमारे भी बच्चे बड़ी शिद्दत से पलते हैं,
आजादी से मोहब्बत के सांचे मे ढलते हैं,
उम्मीदों का बोझ, ना सहारे की लाठी,
बेफिक्र निस्वार्थ कुदरत मे घुलते हैं।
हसरतों की गुलामी तुम करते- करते,
आजादी से उड़ना ही भूल गए हो।
सच, जो इसी मिट्टी से जुड़ा है,
तुम जमीन से जुड़ना ही भूल गए हो।
पंखो का जादू सबको मिला है,
कुदरत ने उड़ना सबको सिखाया।
चाहत के पिंजरे में क्यों कैद है तू,
क्यों तूने खुद को ही इतना सताया।
आजाद परिंदे ने उड़ना सिखाया।
कल शाम वो मेरी बालकनी में आया,
जीने का अलग ही अंदाज पाया।
नन्हे परिंदे ने मुझको सिखाया।
By Rashmi Dadhich

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