पराई भीड़
By Navneet Gill (नवनीत गिल)
क्यों जाने?
अब नहीं माने।
मन चंचल,
जिद्दी बनकर जाये मचल।
बच्चे भांति,
करता है क्रांति।
पाषाण बन,
लेता काँटे खुद-ब-खुद चुन।
सुनके शोर,
तलाशे ऐसा ठौर।
सुकून संग,
छेड़े बस हृदय की जलतरंग।
बग़ैर मेले,
सीख गया अकेले।
चलना अब,
लगने लगी "भीड़" पराई सब।
By Navneet Gill (नवनीत गिल)

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