परदेसी
By Kavita Chavda
तुम अंग्रेज़ थे पर फूंकते नहीं थे। अजीब था ये मेरे लिए। तुमने उस रात जिस तरह से होमस्टे के मालिक से हुए झगड़े में मेरा साथ दिया, तब से जान ने लगी थी तुम्हें। ऐसा सहारा मुझे किसी अपने से भी नहीं मिला था। उस रात मेरे दिल में खूब हलचल हुई थी। वो प्यार की तरसी बच्ची, वो सोला साल की लड़की जिसका दिल टूटा था और आज की मैं जिसने मैं होते ही कितने लोगों को खो दिया था और अपनाई नहीं गई थी, सब रिहा हो चुके थे। ऐसा लगा पहली बार मेरे मैं होने पे मुझे अपनाया गया।
हमारे होमस्टे की बालकनी से हमेशा तुम्हें जैस्मीन टी पीते देखा था। मैंने भी हमारी बालकनी की छोटी छोटी मुलाकातों में पाइनएप्पल और गुलाब की चाय शुरू करदी थी। पहाड़ों के होमस्टे की बात ही अलग होती है। तुम मेरे दिमाग के स्वास्थ्य के लिए सही लगते थे। पिछले कुछ महीनों में मेरे थेरेपिस्ट की बात मान के में दिमागी तबीयत के लिए सही लोगों से ही तालुक रखती थी। हमारी मुलाकात भी तो स्वास्थ्य की वजह से ही हुई थी। तुम मिलो दूर योग के लिए आए थे और में शहर छोड़ के कुछ महीने पहाड़ों में बसने और योग सीखने आई थी। हमारी मुलाकात होमस्टे की देखभाल करते भैया ने पेड़ से तोड़े हुए एप्रिकॉट और अपने बगीचे की हर्बल टी पे कराई थी। शरीर और दिमाग का ख्याल रखते हुए भी में सिगरेट फूंकती थी। तुम मुझे थोड़ा गोर से देख के हस पड़े। मुझे लगा बाकी लोगों की तरह तुम भी मुझे जज कर रहे होंगे। पर तुमने कहां के तुम्हारे यहां तो ये सामान्य है।
उस रात कैफे में मैंने पहली बार सिगरेट छोड़, तुम्हारे साथ ट्रिपी म्यूजिक पे डांस किया था। तुम्हारा साथ काफी होने लगा था। तुम्हारे और करीब आने से पहले मैंने पूछ ही लिया तुमसे के कब लौट रहे हो? तुमने कहां अगले हफ्ते। मैंने अपना दिल एक हफ्ते के लिए तुम्हारे नाम कर दिया और सिगरेट कूड़ेदान के नाम। वो हफ्ते में पूरी तुम्हारे इश्क़ में डूब चुकी थी। मैं, तुम, छोटा सा कमरा, रसोई घर और प्यारी सी बालकनी हमारे इक हफ्ते की दुनिया थी।
होमस्टे वाले भैया और वहां काम करते कुछ हिमाचली लड़के खूब मज़े लेते थे हमारे। कहते थे दीदी फिरंगी भैया और आप जँचते हो साथ में। तुम पूछते थे क्या कहां उन्होंने और में तुम्हें समझाती थी। मेरे साथ रहते तुम पैसों के स्केम से बच रहे थे और तुम्हारे साथ रहते में गांव के बच्चों के फोन में बसी सेल्फी का हिस्सा हो चुकी थी। तुम पनीर बटर मसाला, आलू पराठे और मसाला चाय के आदी हो रहे थे और में पैनकेक, पंपकिन ब्रेड और जिंजर लेमन हनी को अपने खुराक में शामिल कर चुकी थी। तुम्हारी बाँहों में बिताए वो मुलायम वक़्त ने मुझे मेरे जीवन भर के सुकून की कमी को चंद रातों में भर दिया था। तुम्हारे साथ जागती आलसी सुबहो में मैं खुद में जाग रही थी। तुम किसी फरिश्ते से आए थे मेरी ज़िन्दगी में।
हफ्ते के आखरी दिन हम हमारे पसंदीदा कैफे में खाने के बाद इक आखरी बार वहीं झरने के पास बैठ के इक दूसरे से खामोशी में बाते की थी। वो खामोशी भरी गुफ्तगू मुझे जीवन के मायने सीखा गई। तुम्हें एयरपोर्ट छोड़ के वो बिस्तर में सोने का मन नहीं किया। सोचा नए घर की तलाश में कल सुबह निकलूंगी। मैंने बस्ता जमाया और बालकनी में पहाड़ी बत्तियों को देखते बगल वाली कुर्सी में भयंकर खालीपन महसूस किया। ये खालीपन भरने में अब एक साल का इंतजार था। इस एक हफ़्ते के साथ ने हमें यकीन दिला दिया था की हम एक दूसरे के लिए ही बने है।
तुम्हारी फ्लाइट से भेजी सेल्फी देखते हुए और जैस्मीन टी पीते हुए मैंने सारी रात बालकनी में ही गुज़ारी। हिमाचली लड़के भी जाग रहे थे, गाने बजा रहे थे। इतने में ही गाना बजा ‘परदेसी, परदेसी जाना नहीं, मुझे छोड़ के मुझे छोड़ के’। मेरी आंखों में बंधा बांध और सिगरेट का नया पैकेट दोनों फिरसे खुल गये।
By Kavita Chavda

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