परछाई
By Sushmita Sharma
मैं हूँ परछाई,
तुम्हारा संपूर्ण सार,
हमेशा साथ चलने वाली,
हर पल साथ निभाने वाली,
सूरज उगने से अंधेरा होने तक,
तुम्हारे साथ आती हूँ,
तुम्हारे साथ जाती हूँ,
बिना कुछ कहे,
बिना शिकवे शिकायत के,
तुम्हारे कंधे से कंधा मिलती हूँ।
तुम शायद असमंजस में हो,
कि अंधेरे में मैं
कहाँ गुम हो जाती हूँ ,
जिस तरह बच्चा प्यार से माँ के आँचल में छिप जाता है,
मैं भी कहीं नहीं जाती,
बस तुम में समा जाती हूँ।
तुम्हारे जन्म से तुमसे बंधी ,
मृत्यु बिना ना टूटेगी ये डोर,
रोशनी में मैं
दिखती अलग हूँ,
पर अंश हूँ तुम्हारा,
तुम बिन ना कोई और।
By Sushmita Sharma

Nice
Amazing
Amazing , written to perfection.
Excellent
Beautifully written, Amazing!