पता नहीं
By Nupur Jain
बहौत अंधेरा हैं घेरे मुझे
दूर दूर तक कुछ दिखता नहीं
बंद करु आंखे अगर
तो एक रोशनी सी लगती है
जाने कहां से है आ रही ?
कहां को है जा रही?
पता नहीं
कुछ दूर एक छवि नज़र आती है
धुंधलापन है
सच कोई है वहां?
या
किसी के होने का भ्रम हो रहा है?
पता नहीं
थोड़ा आगे चलकर देखा
तो एक शक्स नज़र आता है
जो पुराना सा एहसास दिलाता है
कौन है वह?
क्या वो तुम हो?
पता नहीं
इस कश्मकश में कुछ कदम चलती हूं
जैसे जैसे बढ़ती हूं उस अक्स की तरफ़
वो आगे बढ़ चलता है
मैं गति ज़रा बढ़ती हूँ अपनी
वो और तेज़ चलने लगता है
क्यों ?
पता नहीं
उसने एक काली सी टोपी है पहनी
शायद वो उस रोशनी की ओर चल पड़ा है
मै अब भी उसके पीछे हूँ
अबकी बार पहले से करीब
कुछ दो-चार कदम दूर
मै क्यूँ हूँ अब भी उसके पीछे ?
वो क्यों अब तक मुड़ा नहीं ?
पता नहीं
मैने अपना हाथ उसकी तरफ़ बढ़ाना चाहा
शायद मेरे कदमो की आहट से वो रुका भी
मुड़ता है वह एक पल के लिए
उस एक पल
उस छोटे से पल में
मेरी नज़रे उसकी निगाहों से तकरा गई
फ़र्श से होकर उसकी तरंगे मुझ तक आ गई
बदन में फुव्हारे फूटने सा एहसास होने लगा
हलकी-सी मुस्कान मेरे ओठों पर हैं
क्यों ?
पता नहीं
इतना कुछ हुआ उस एक पल में
कि मैं उसका चेहरा देख ना पाई
इससे पहले मेरी नज़रे उसके चेहरे पर जाती
वो फिर एक बार चल पड़ा
उस रोशनी की ओर
क्यों ?
पता नहीं
वो चलते- चलते उस रोशनी से जा मिला
मैं वहां खड़ी देखती रही उसे
वो जा मिला उस रोशनी से
मैं दूर से ही निहारती रही
क्यों ?
पता नहीं
जैसे ही वो उस रोशनी से जा मिलता है
उस एक छण के सिवा मुझे कुछ नहीं दिखता है
घना अँधेरा हर तरफ़ से मुझे घेर लेता है
उस रोशनी को खोजने का पता लिए
उस अंधकार में कैद हो रही मैं
उस एक पल के सहारे
क्यों?
पता नहीं
By Nupur Jain

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