पचास साल बिता दिए
By Shobha Joshi
कैसे झेलूँगा मैं
सोचते सोचते
पचास साल बिता दिए
श्रीमती जी
पुराने सुनोगी या
गीत नए ।
तुमने मेरा घर भी सजाया
मेरे लिए स्वादिष्ट खाना भी पकाया
मैं जब थक कर घर आया
तुमने अदरक वाली चाय भी पिलाई
और जतन से मेरा सर भी दबाया
मेरे सुख चैन के लिए
तुमने अपने दिन रात भुला दिए
कैसे झेलूँगा मैं
सोचते सोचते
पचास साल बिता दिए।
तुम्हारी मुस्कुराहट से
मेरे त्योहार सजे
तुम्हारी चुलबुलाहट से
मेरे मन के तार बजे
तुम्हारी खिलखिलाहट से
मेरे सुनेपन को नए श्रव्य मिले
पर न जाने कब-कब
मेरी मैं के लिए
तुमने अपने मनोरथ दरकिनार किए
कैसे झेलूँगा मै
सोचते सोचते
पचास साल बिता दिए।
जीवनसंगिनी तुम मेरी
अर्धांगिनी तुम मेरी
सहगामिनी तुम मेरी
जीवन के हर पग पर अनुगामिनी तुम मेरी
कर्म पथ पर सहचरी तुम मेरी
उलझनों की जैसे प्रहरी तुम मेरी
जीवन शानदार रहा जरूर
पर असहनीय पीड़ा भी मिली
और हर पीड़ा सह मैं सका
बनी वो प्रेरणा तुम मेरी
मेरे किरदार निभाते-निभाते
तुमने अपनी पहचान के चिन्ह
अपनी खुशी से गुमा दिए
कैसे झेलूँगा मैं
सोचते सोचते
पचास साल बिता दिए।
तुम साथ चली
मैं कच्चे रास्तों को पक्का करता गया
तुम साथ चली
मैं सारी चढ़ान चढ़ता गया
तुम साथ चली
मैं धूप-छाँव सहता गया
तुम साथ चली
मैं अपने परायों के बीच
अपनी पहचान बनाते गया
तुमको मुझसे मुझको तुमसे
अच्छा जीवनसाथी भी मिल जाता
पर उन मनोरथों को कदाचित
वो “भव्यता” मिल न पाती
जो मैंने-तुमने मिल कर साथ किए
कैसे झेलूँगा मैं
सोचते सोचते
पचास साल बिता दिए।
By Shobha Joshi

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