नज़रिया
By Anushree Bhandekar
बदलाव जरुरी है | और बालना तुम |
उस पुराने से नया बना तुम |
पर पुराना होक भी छूटता नहीं |
अतीत बीत जाता है पर यादोंसे जाता नहीं |
फिर उसी याद को याद रखना तुम|
बुरा था, दर्द गहरा था, जैसेभी था बास अपनालो तुम |
बल्कि उसी में रहकर नज़रिया बदलना तुम |
बस नज़रिये का नज़रिया बदलना तुम |
याद है? बचपन में साइकिल से गिरे थे,
निशान धुंदला है, पर गिरने का किस्सा आज भी याद है |
हार मत मानो ये पहली बार सीखे थे तुम |
नहीतो दो पाइयोसे चार पर कैसे एते तुम |
बचपन में रोएथे आज उसीको याद करके हस्ते हो तुम |
बल्कि उसी में रहकर नज़रिया बदल पाये हो तुम |
इसी तरह नज़रिये का नज़रिया बदलना तुम |
पहले कभी बस छूट जाति थी तोह दिन को कोसा करते थे |
आज जल्दी पोहचकर खुदका दिन खुद बनलेते है |
कभी बिन मौसम बारिश मिलती थी तोह छत ढूंडा करते थे |
आज कल तोह हाष्टाग लव बारिष रील्स अपलोड करते है |
खुदसे खुदके तजुर्बेकि दोस्ती करना तुम |
बल्कि बीते पलोको नये नज़रिये से जीना तुम |
बस नज़रिये का नज़रिया बदलना तुम |
अब चोट डिल, दिमाग, चरित्र पर लगी है |
उम्मीद, विष्वास, आत्मविष्वास सुब टूट गया है |
नज़रिया खुदका होता तोह बदल भी देते, समाज का बदलना नामुमकिन है I
तोह फिर क्यों दूसरों के नज़रिये को अपना बना रहे हो तुम I
समाज में बदलाव आने से पहले खुद बदलना तुम,
नजरिया खुदका बदलना है तोह उम्मीद भी खुदसे रखना तुम
बलके काटों को निचे रखकर फूल बनकर ऊपर खिल कर आना तुम I
बस नज़रिये का नज़रिया बदलना तुम |
By Anushree Bhandekar

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