नज़रअंदाज़
By Himani Bhardwaj
न इतना नज़रअंदाज़ किया कर
की नज़रअंदाज़ ही हो जाऊं मैं।
तू ढूंढे नज़र से
और यादों में खो जाऊं मैं।
इंतज़ार किया बोहत तेरा
कहना भी चाहा इशारों में कई बार ।
तू जान कर भी बन गया अनजान
दिल की बात न की कभी बयां।
चाहत थी मैं कल तेरी
जाने क्या है रज़ा आज की तेरी।
चाहे भी और न भी चाहे मुझे
क्या है पहेली मुझको न सूझे।
जो भी है मन में कहीं , आ कह दे बिन डरे
वादा है न इलज़ाम देंगे कोई।
यूँ दोस्त बन पर जी न पाएंगे अब
या तुझ पर मर मिटेंगे, या मर ही मिटेंगे अब।
By Himani Bhardwaj

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