नारीत्व
By Arpita Yadav
सूर्य को पृथ्वी का ,
भूगोल बताने आते हैं।
कुछ जन जागन,
नारी को नारीत्व सिखाने आते हैं।
बस ढकी रहो तुम,
दबी रहो तुम,
मर्यादा ये कह जाएगी।
बंद रहो तुम कोठियों में,
अतः पौरुष की खाल भी रह जाएगी।
ये सौगात नूरानी करते हैं,
तो चलो ज़रा बात पुरानी करते हैं।
एक हँसी से अंकित होकर,
दो बोल से चकित रह कर,
पूरा पौरुष हिल जाता है।
जो हँस दे द्रुपद, और वर्ण दे सीते,
फिर पूरा साध्य संत और ध्यान मग्न ,
बस धरा का धरा रह जाता है।
अभिमान तो इतना धूर्त है,
पंचग्राम खातिर पौरुष में ,
भ्राता भी अछूत है।
अरे, सती छोड़ गई काया को,
सीते ने धकेला माया को,
द्रुपद त्यागी पंच पौरुष बल,
जो समेट न सका एक छाया को ।
कलयुग का कल भी आया,
भूचाल विकट इस थल भी आया,
वाह री विडंबना!
कैसी करनी ,
फिर रही मारी , जग की जननी।
By Arpita Yadav

Very noice😵💫🧃✨️
Love itt🤍
🌟👏
Fabulous poem🤯👏👏
An Epicness like " Nareetva"....