ना जाने क्यों (Naa Jaane Kyun)
By Sameer Agarwal
मैं रोता रहा उसकी याद में रात भर,
वह रह-रहकर मेरे ज़हन में आती रही।
मैंने चाहा ना आए उसकी याद कभी मुझको,
फिर उसी की कमी जाने क्यों मुझको जलाती रही।
न जाने क्या रुसवाई है मुझसे उस खुदा की,
जो यह दुनिया हमेशा ही मुझको सताती रही।
उसकी यादों ने छोड़ा ना उस वक्त भी पीछा,
जब सारी रात साकी मुझको पिलाती रही।
नहीं जीना ऐसी तपिश के रूबरू मुझको,
वो हर शब जो ख्वाबों में यूं ही आती रही।
मेरी नाकामयाबी का जो वो यूं तकाजा़ करती है,
लगता है मेरी मजबूरियां उसको कुछ तो भाती रहीं।
जब ढूंढने चला मैं मेरे चाहने वाले इस जमीं पर,
एक खाली सा जहां ये दुनिया मुझको दिखाती रही।
और पूछा जो सबब मैंने इस बेसलूकी का उससे,
वो लायक इसी के जाने क्यों मुझको बताती रही।
By Sameer Agarwal

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