नवनिर्माण
By धनंजय प्रताप शर्मा
तमलीन जगत में भव भय भंजन,
व्यथित, क्षुदित व व्याकुल जन-मन,
प्राची के चर कमलों पर अर्पित
दूरस्थ, आलोक, प्रदीपित मधुबन,
गंगा, जमुना, सरयू तट पर
कृष्ण-राम का नाम निराला,
युग-युगांतर, निशि-दिन बीते
पर दीपित हिन्दुस्थान हमारा,
यह चंद्रगुप्त का अभिनव भारत
जिसका स्वप्न चणक ने पाला,
पुरुषोत्तम की समर भूमि
एक ओंकार की अमृत माला,
जगत व्याप्त जिसका प्रकाश
तम का जिसने करके विनाश,
रणचंडी का यह भैरव स्वर
गृह-नक्षत्रों का अनुकाश,
इसी धरा पर देह दान कर
इंद्र वज्र निर्माण हुआ है,
भागीरथ की यह कर्मभूमि
जिसपर गंगा आह्वाहन हुआ है,
राष्ट्रप्रेम की लौं से ज्योतित
कोटि-कोटि दीपशिखाए,
मुरलीधर का यह मोहित स्वर
धीर-वीरता की गाथाएं,
कोटि-कोटि पुत्रों की माता
फिर भी चोटिल, अपमानित क्यों?
अब भी उसके कर पर बंधन
अखंड राष्ट्र गौरव बाधित क्यों?
हे मनु के वंशज
परशुराम के हे अनुयायी,
निज-हित साध अनुचर पाया
पर-हित साध बनें सहयायी,
रश्मिरथी के पथ पर चलकर,
काल चक्र की गति पर चढ़कर,
सप्त सिन्धु को पार करें,
भारत का नवनिर्माण करें।
पृथ्वीराज ने नयन न मूंदे
भय से न दृग अकुलाए,
अपमानित जब हुआ वह गौरी
अंबक, भाठी लौह से पिघलाए,
द्रवित हुए दोनो लोचन
और रुधिर धारा प्रचंड
मातृभूमि रक्षार्थ निमित्त,
अद्वितीय आत्मोत्सर्ग अखंड,
चार बांस, चौबीस गज
अंगुल अष्ट प्रमाण,
ता ऊपर सुल्तान है
मत चूको चव्हाण,
अब मत चूको चव्हाण के
गौरी फिर से बच पाए न,
अहि को जीवनदान ना देना
वह हालाहल लाए ना,
राष्ट्रप्रेम के अतुलित बल से
राणाओ ने सोम पिया था,
दिल्ली की देहली पर चढ़
मुगलों को हुंकार दिया था,
समर भूमि में विक्षत सांगा
राष्ट्रप्रेम अब भी अक्षत है,
चित्तौड़ दुर्ग में हुआ प्रज्वलित
क्षत्राणी का जौहर रक्षत है,
मान सिंह ने किया समर्पण
राणा ने अनुचर ठुकराया,
हल्दीघाटी की बलि वेदी पर
हर्षित होकर सर्वस्व लुटाया,
नयन, चर्म, देह-अंग विलग कर
अमर हो गए बंदा बैरागी,
निर्भय, निष्छल, बलि पर प्रतिपल
श्री गुरुतेग की दिल्ली साखीं,
बलिदानी शोणित को लख कर,
मातृभूमि के क्रंदन स्वर पर,
निज के सुख का त्याग करें,
भारत का नवनिर्माण करें।
देवभूमि के अटल भवन में,
ज्ञानदीप का तेज अल्प क्यों?
विश्वगुरु महिमा मंडल का
स्वर्णकाल अब हुआ कल्प क्यों?
धर्म, सभ्यता की देहरी पर
प्रथम दीप की वृत्तिका गत क्यों?
तुझसे प्रेरित जिसका जीवन
उसके पग में अब तू नत क्यों?
त्मावृति गर्त में क्यों लय है
अंत:स्थल की कंचन काया?
रिपु के अमित व्रणो को सहकर
प्रेम शांति का पाठ पढ़ाया,
हथप्रब, शंकित क्यों बैठा अब,
वीर धरा का गौरव वासी?
सर्वदा तुंग है श्वेत हिमालय
सृष्टि केंद्र है तेरी काशी,
धराशाही, परिश्रांत जान कर
जग ने मां का मुकुट चुराया,
आज अनल की ज्वाला पीकर
महाबली अतुलित बल आया,
श्रीहीन परिधि बंधन से
नवभारत को तरना होगा,
भिक्षा से शिक्षा के मग पर
स्वाभिमान ले अड़ना होगा,
भारत की हे आकृद्ध भुजाओं
फिर से शर संधानो,
पाञ्चजन्य के हे उन्मत्त स्वर
फिर से अरि संघरो,
निशि का तिमिर वर्ण अब छूटा
राष्ट्रप्रेम नवप्राण हुआ है,
उदयाचल ललाट पर मंडित
दिनकर नवनिर्माण हुआ है,
आज प्राण को शून्य जानकर,
महासमर हित देह दान कर,
फिर से गौरव गान करें,
भारत का नवनिर्माण करें।
By धनंजय प्रताप शर्मा

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