नवजीवन
By Madhu Priya Hembrom
दूर झितीज मे धरा को चीर
सूरज निकलने को है आतुर
ली अंगडाई जरा सी
लालिमा बिखेर नभ मे
हुई कंपन टूटी जग की तंद्रा
अलसाए तन मे लगे ठंडी हवा का झोंका
मधुर कलरव ने छेङी ऐसी तान
जर जरा मे हुआ प्राणी का संचार
देख लालिमा नन्हा अंकुर मुस्काया
ली हरकत किया स्वागत पुष्पदल ने
बाहें फैलाए सतरंगी
हुए मगन चंचल चपल अंतरंगी
हुआ नवजीवन का संचार हठीली
अब क्यो मन न छोङे उद्वेग गंगा तीरे
बिसरा के अतीत पलट नया पन्ना
सीख प्रकृति से बवंडर मे भी फाहे सा फिरना ।
By Madhu Priya Hembrom

Comments