नन्हे नन्हे हाथ
Updated: Oct 10, 2022
By Sakshi Begwani
मुकुर में देखा जब खुदको
विरल सा यह तम छाया
कितनी पीड़ा में थे वो
ऐसा यह सवाल आया
यह बात बरसों पुरानी है
सुनी दादी नानी की जुबानी है
कैसे जिया करते थे वो
इसी बात की हैरानी है
छोटे छोटे बच्चे थे वो
जब कलम पकड़ना सीखा था
कर्छी, सिलाई, बुनाई, कढ़ाई
कितना कुछ सिखाया था
गुड्डा, गुड्डी के खेल खेल में
ब्याह का जोड़ा पहनाया था
पढ़ाई, लिखाई को छुड़वाकर
अनजान जगह पर भेजा था
छोटे छोटे घर नहीं थे
तब परिवार बड़ा होता था
उन नाजुक से कंधो ने
कितना बोझ ढोया था
खुद को सम्हालने की उमर में
बच्चा गोद में थमाया था
बेद भी गिने चुने थे
अस्पताल भी कहा पर था
सोचो क्या बीती होगी उन पर
जिसने बच्चा खोया था
कच्ची थी उम्र उनकी
पर कितना कुछ वो सहते थे
ये भी तो सोचो उनका
क्या होता होगा
बाल अवस्था में जिसने
सुहाग को खोया था
रूढ़ी वादी सोच थी तब
कितने तानों को वह सहते थे
उन बेचारी बच्चियों पर
कितने जुल्म ढोए जाते थे
उन नन्हे नन्हे हाथों को
कितना कुछ करना पड़ता था
छोटी सी उमर से ही
बढ़ा बनना पड़ता था
आज सुनकर उनकी गाथाएं
दिल ये यू रोता है
कितने अत्याचार हुए उन पर
जोर जोर से कहता है
जोर जोर से कहता है
By Sakshi Begwani

Comments