नन्ही सी जान
By Shyam Kamat
जब से पापा ने उठाया है गोद में मुझे ,
लगे है हालत घर के बदलने में ।
जब से माँ ने दिया है जन्म मुझे ,
रोज़ खिलाती है हाथों से मुझे ।
आँखो से होने ना देती एक पल भी ओंझल मुझे ।
आज हूयी थोड़ी सी चूक उनसे ,
पड़ोसी पे किया भरोसा ।
मुझे छोड़ा उनके घर में अकेले ,
देख मुझे आया लालच उसे ।
क़रीब आके मेरे मुझे छूने लगा,
मैं मासूम सी जान ,
मुझे हवस क्या पता लगे ।
दरिंदगी दिखायी उसने ,
मिटायी पहले अपनी हवस उसने ,
जब डर गया देख के हालत मेरी ।
उतारा मौत के घाट मुझे ।
फिर लोग न्यूज़ सुनके कहने लगे ,
कपड़े होंगे ख़राब उसके ।
सुनो ना अंकल
सुनो ना आँटी
3 साल की उम्र मेरी
3 फ़ीट की हाइट
मैंने कैसे किसी की हवस जगायी ?
ना जाने पहना मैंने ऐसा क्या था ,
हवस जागी उस दरिंदे के ज़हन में ।
अब आप ही बताओ कैसे पहनू आपकी तरह साड़ी मैं ।
जिनके खुद के शरीर पे फटी बानियाँ हो ,
उन्होंने पहनाया था लाके फ़्रॉक मुझे ।
कैसे कहदूँ ज़माना दरिंदा है पापा
ला दो सूट सलवार मुझे ।
कैसे ,
बताओ ना
कैसे ,
बताओ ना
फ़्रॉक में ढँकी थी मैं पूरी आँटी
साड़ी में फिर भी पेट है दिखता ।
सोच के ज़रा मेरी उम्र तो देखो
कैसे किसी इंसान का ईमान है बिकता ।
माँ की मेरी आयी थी गिनी चुनी सैलरी आज ,
माँ गयी थी लाने मेरे बर्थ्डे की केक आज ।
आयी वापस
देखा मुझे खून में लतपत ,
उस हैवान ने तो ना छोड़े थे एक भी कपड़े मेरे शरीर पर
और ना जाने कितने दिए थे उसने ज़ख़्म मेरे अंदर ।
ये समाज ये अंकल ये आँटी
सबसे मेरा एक सवाल ,
अब आप ही बता दो ना ,
कहाँ गयी थी वो लड़कों के संग में
कौन से पार्क में देखा था आपने उसे किसी के संग में ।
कौनसी थी वो बदचलन ,
कौनसे लड़कों को भड़काया था उसने ।
कौनसे लड़कों को किए थे इशारे उसने ,
कौनसे पहने थे ग़लत कपड़े उसने ।
3 साल की उम्र उसकी
3 फ़ीट ही हाइट
3 साल की नन्ही जान वो
ना जाने उसने की ऐसी क्या भूल जो ।
समाज समाज समाज
समाज की ये रूढ़ि वादी विचार
सोच में तुम्हारी ये लड़कियाँ ही ग़लत ,
शॉर्ट्स पहन के निकले
या निकले किसी लड़के के साथ में ।
जॉब पे जाए
या रहे सज संवर के घर में ।
फ़ोन पे किसी से बातें करे ,
या उठाए अपने हक़ के लिए आवाज़ ।
पढ़ाई करे तो ग़लत
जॉब करे तो ग़लत
अपनी पसंद से शादी करे तो ग़लत
घर और समाज की सुन कर करे शादी
फिर करे सुसाइड या हो जाए उसका मर्डर …
तो भी बस लड़की ही ग़लत ।
बिना सोचे ही लगा देंगे इल्ज़ाम ,
उसके लक्षण नही थे ठीक
उसके चर्चे थे हज़ारों में
उसकी हरकतें जैसे ना जाने वो रही हो बाज़ारों में ।
समाज समाज समाज
ये साला हमारा समाज ही ग़लत ।
गाली देते देते इस समाज को
आया खुद को एक बात समझ में ।
कौन है समाज का हिस्सा
कौन है इनका शिकार
क्यू नही खुद बढ़ते आगे
क्यू नही करते हाहाकर ।
क्यू नही करते हाहाकर ।
क्यू नही करते हाहाकर ।
By Shyam Kamat

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