नदिया
By Simran Thakur
हिमालय की यह बेटियां
करती अपनी शुरुआत पर्वतो से।
ऊंचे-ऊंचे शिखर को चिरतीं,
निकले उनकी कोख से।
करती है तय मिलो सफर
बिना रुके, बीना थके।
बहती है इनकी धारा
बसते हैं कई जीवन इनमें,
हर जीवन का आधार है तरंगिनिया,
कभी ध्यान से समझना इन्हे।
जब निकलती चिरकर बड़ी-बड़ी चट्टानो को
तभी शीतल जल इनका
जीवित रखे करोड़ो को।
कितना कुछ सिखाती है प्रवाहिनिया,
अपना रास्ता खुद बनाती यह सरिताएं।
विशाल पत्थरो से भी निडर,
यह तो बस अपनी राह बनाये।
जल को इनके कहाँ कोई रोक पाए
इनकी धारा आगे बढ़ती ही जाए।
बिना रुके शुरुआत है करती,
बिना थके मंजिल तक है पहुंचती।
अपनी जिम्मेदारियां खूब निभाती है नदिया।
मत्स्य जीवन को देती आश्रय,
स्थलिय जीवन को अपना नीर,
वनस्पतियों को तर करदे,
इनकी मात्र लहर भर।
नदिया न थामे हार का साथ,
सोचो, अगर करे एक क्षण भी आराम
संकट में पड़ जाए जीवन हजार।
गंगा, यमुना, सरस्वती, ब्रह्मपुत्र, सिंधु, गोदावरी,
कावेरी, नर्मदा, महानंदी, सतलुज, तापी, चिनाब,
न जाने कितनी अन्य नदिया हैं
यहां जीवन बचाने को।
पूजता मानव समाज
अपने दुख हरने को।
पर दुख है कि भूल रहा है मनुष्य,
जननीयो की पवित्रता को।
कूड़ा -कचरा फेके इनमे
करते हैं सब दूषित।
शीतल जल को करें प्रदुषित,
क्यू न समझें ये मानव जाति।
समझना होगा अब हमें,
ना करें और इन्हे प्रभावित।
नहीं तो भविष्य पढ़ जाएगा संकट मे ,
समय से सम्भलना होगा हमें।
सम्मान करना होगा इनकी पवित्रता का,
बचाना होगा दिखाकर अपनी मानवता।
कुछ भी मुश्किल नहीं
इन्हीं के दिए रास्ते हैं बस चलना।
ठान ले अगर रखना है इन्हे साफ
नहीं मिलेगी गंदगी बिलकुल भी।
शुरू करेंगे तो मंजिल मिलेगी
उम्मीद मिलेगी होंगे कामयाब।
चमक उठेगा इनका शीतल जल,
जब करेंगे मिलकर काम
इन प्रवाहिनीयो की ही भाति,
एक कदम के साथ करेंगे शुरुआत।
By Simran Thakur

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