नई आग
Updated: Jul 28, 2025
By Yogesh Kumar Pradhan
बुझी तनिक जो चिंगारी,
तब दिखी मनुज की लाचारी,
भड़के स्फुलिंग का अंत हुआ,
तो क्या ये भाग्य अनंत हुआ।
मीलों का तय करने को सफर,
निकले थे घर से उदय पहर,
तिमिर देख, मन बैठ गया,
अवधारित हीय भी ऐंठ गया।
क्या अंत ज्योति का तम ही है?
झुक कर चलना क्या धरम ही है?
यदि है तो धरम को तोड़ दिखा,
तम का अंधियारा मोड़ दिखा।
तेरी मुक्ति का है साधन तू,
कर ज्योति का आवाहन तू,
तेरे मन ही है आग दबी,
जय गर्जन के हित राग सभी।
तो छुपी अश्नी को आग बना,
अपने हित विजय का भाग बना।।
By Yogesh Kumar Pradhan

Comments