धुआँ से अस्तित्व तक
Updated: Jul 15, 2025
By Sanchi Joshi
मैं तो बिखरकर धुआँ हो जाती,
शून्य में गुम, एक स्मृति मात्र रह जाती।
पर मेरी कविताओं ने मुझे थामा,
खुद के भीतर जलने से बचाया।
जब दर्द ने दिल को चीर दिया,
और ख़ामोशी ने सब कुछ घेर लिया,
तब शब्दों ने आकर सहलाया,
जख़्मों को जैसे मरहम लगाया।
कभी मेरी स्याही रोती रही,
कभी मेरे अक्षर मुझसे लड़े।
पर हर बार, वे मुझे समेट लेतीं,
टूटने से पहले मुझे खुद में समा लेतीं।
मैंने देखा है,
कैसे कागज़ मेरे आँसुओं का बोझ सहता है,
कैसे हर कविता मेरी रगों में दौड़ती है,
एक नदी की तरह,
जो मुझे बिखरने नहीं देती।
अगर कविताएँ न होतीं,
तो मैं बस एक धुआँ होती,
जो हवा में कहीं गुम हो जाती।
पर वे हैं, तो मैं हूँ—
निरंतर, अनंत, अमिट।
By Sanchi Joshi

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