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धरती का क्रंदन: प्रकृति का अटल विधान

Aug 11, 2025
2 min read

By Preetika Gupta


वसुधा का असली स्वामी, प्रकृति का ही नाम, 

मनुज ये भ्रम पाले, कि वही है इसका धाम। 

सदियों से जो सहती आई, अब वो उठी है जाग, 

विनाश का नगाड़ा बजेगा, होगा प्रलय का आग।


धाराएँ सूखीं, पर्वत रोते, हवा में ज़हर घुला, 

लालच की अंधी दौड़ में, इंसान कितना झुका। 

काटे वन, खोदी धरती, ज़हर बोया पानी में, 

अंजाम क्या होगा, इस खुदगर्जी की कहानी में?


चीख रही है ये धरा, बचा लो मुझे, हे मानव! 

कब तक यूँ लूटते रहोगे, क्यों भूले तुम दानव। 

प्रकृति का नियम अटल है, लौटाती है वो सब, 

जो तुमने दिया उसे, वही पाओगे तुम अब।


संभल जाओ, समय है अब भी, छोड़ो ये अभिमान, 

प्रकृति की शरण में आओ, पाओ अपना सम्मान। 

वरना जिस दिन ये रूठेगी, ना बचेगा निशान, 

प्रकृति ही स्वामी थी, है और रहेगी, यही अंतिम ज्ञान।


होगा महाकाल का तांडव, जब टूटेगा धैर्य इसका, 

मिट जाएगा अहंकार तुम्हारा, बच पाएगा ना अंश इसका। 

हर एक कण में समाई है, ये उसकी ही शक्ति है, 

जागृत हो जाओ, वरना, होगी सिर्फ़ विकृति है।



व्याख्या:- क्या हमने कभी सोचा है कि इस विशाल धरती का वास्तविक मालिक कौन है? हम इंसान अक्सर इस गलतफहमी में जीते हैं कि ये पूरी कायनात हमारी है, कि हम ही इसके सर्वेसर्वा हैं। लेकिन ये कितना बड़ा भ्रमजाल है! इस वसुधा का असली स्वामी तो प्रकृति है, और केवल प्रकृति ही है।


सदियों से प्रकृति ने हमें सब कुछ दिया है – जीवनदायिनी हवा, निर्मल जल, उर्वर धरती, उपजाने को अन्न। उसने बिना किसी शिकायत के हमारी हर ज़रूरत पूरी की। पर हमने क्या किया? हमने उसकी उदारता को उसकी कमज़ोरी समझ लिया। हमने अंधाधुंध वृक्ष काटे, नदियों को प्रदूषित किया, पहाड़ों को विदीर्ण किया, और हवा में ज़हर घोला। हमने अपने लोभ की अंधी दौड़ में इतना कुछ खो दिया कि अब प्रकृति भी चीख उठी है।


नदियाँ सूख रही हैं, पर्वत अश्रु बहा रहे हैं, और हवा में अब साँस लेना भी दूभर हो गया है। ये सब हमारे ही कर्मों का फल है। हमने सोचा कि हम प्रकृति को जीत लेंगे, उसे अपने अधीन कर लेंगे। पर हम भूल गए कि प्रकृति का नियम शाश्वत है। जो हम उसे देंगे, वही वो हमें प्रतिफल में लौटाएगी। अगर हमने उसे विनाश दिया है, तो विनाश ही हमारी नियति बनेगा।


आज धरती कराह रही है। वो हमसे गुहार लगा रही है कि उसे बचा लो। समय आ गया है कि हम अपना मिथ्या अभिमान त्यागें, अपनी गलतियों को स्वीकारें, और प्रकृति की शरण में जाएँ। वरना जिस दिन प्रकृति का धैर्य भंग हुआ, जिस दिन उसका विकराल महाकाल रूप जागा, उस दिन कोई निशान नहीं बचेगा। न हमारा, न हमारे नगरों का, न हमारे झूठे दर्प का।


याद रखिए, प्रकृति ही स्वामी थी, है और रहेगी। यही इस ब्रह्मांड का सबसे बड़ा सत्य है। अगर हम इस सत्य को नहीं समझेंगे, तो हमारा भविष्य अंधकारमय गर्त में समा जाएगा। आइए, इस चेतावनी को गंभीरता से लें और प्रकृति का सम्मान करना सीखें, इससे पहले कि बहुत देर हो जाए।


By Preetika Gupta


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