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दफ़्तर का एक किस्सा

By Alok Singh


अपनी नौकरी के ढाल-चलन से परिचित होने के बाद मेरे मन मे खयाल आया की क्यूँ न दूसरे दफ्तरों से सीखकर अपने ऑफिस मे सुधार लाया जाए। इसके चलते मैंने प्रेरणा लेने के लिए दूसरे सरकारी विभागों का मुआयना करने का सोचा।


इसके तहत एक रोज़ मै एक सरकारी दफ़्तर में समय से पहले, दस बजे ही पहुँच गया। नौ बजे दफ़्तर के दरवाज़े खुल जाते हैं, पर फाइले साढ़े दस से पहले मुहँ नहीं खोलती। आदमिय़ों के इंतजार में मुझे तीन कुत्ते नज़र आए। सबसे आगे वाला कुत्ता सबसे बड़ा था। उसके पीछे दो और कुत्ते उसके दाहिनें और बाएँ चल रहे थे।सबसे आगे वाले कुत्ते का रौब ही कुछ अलग था। जब आगे वाला कुत्ता पूँछ हिलाता तो पीछे वाले भी हिलाते। थोड़ा दूर चलने के बाद बड़ा कुत्ता रुका , उसने जमीन को सूंघा और फिर गर्दन को मोड़ा और दूर बैठी गाय पर भोंका।पीछे वाले दोनों कुत्ते भी रुके, ज़मीन सूंघी, और गाय पर भौंकने लगे। आगे वाला कुत्ता तो एक बार ही भौंका, परंतु पीछे वाले तो मानों गाय कों भौंक- भौंक कर मार ही देते। जब सामने वाले कुत्ते को संतुष्टी मिलि तो वह आगे बढ़ा, एक पेड़ के पास जाकर पैर उठाया और पेड़ को पानी दे दिया। पीछे वाले गुर्गों ने भी यही किया।




मैं कुत्तों का विश्लेषण कर ही रहा था कि दूर से बड़े बाबू फाइल हिलाते हुए नज़र आ गए। बड़े बाबू से पीछे दो छोटे बाबू थे। वो दोनों बड़े बाबू के पीछे दाहिने और बाएं, फाइले हिलाते हुए नज़र आ रहे थे। बड़े बाबू का रुतबा देखते ही बनता था। चलते-चलते बड़े बाबू को कुछ याद आया, वो रुके, अपनी फाइल खोली कुछ पन्ने इधर-उधर किए और फिर उन्होंने दूर बैठे माली को टेढ़ी नजर से देखा और चिल्ला कर बोले, " क्या कर रहे हों यहाँ बैठ कर? ऑफिस शुरू हो चुका हैं।" छोटे बाबुओं को भी अचानक कुछ याद आया और रुककर फाइल के पन्ने खगोलने लगे। और उसके तुरंत बाद बाबुओं ने माली पर गलियों की छड़ी लगा दी। बेचारा माली भी सोच रहा होगा कि बाग में बैठने से अच्छा, दफ़्तर में ही बैठ जाता। और फूलों के बदले अगर बड़े बाबू की मेज को ही पानी दे देता तो इतना सुनना नहीं पड़ता। जब बड़े बाबू को संतुष्टी मिल गई तब वह आगे बढ़े और पास के पेड़ के पास जाकर हाथ उठाया, मुँह पिचकाया और पान की पीक से पेड़ रंग दिया। पिछे वाले बाबूओं ने भी पेड़ों पर अपनी कला का नमूना दिखाया। बाबुओं की ये कला मुझे रास न आई तो मैंने अपना मुहँ दूसरी तरफ फेर लिया।


इस ओर मुझे फिर से उन्ही तीन कुत्तों का झुंड नज़र आया। तीनों नाली मे मुहँ डाल कर पानी पी रहे थे। पहले बड़ा कुत्ता पीता, फिर छोटे। नाली का पानी पीता देख मुझे कुछ अजीब लगा तो मैंने फिर नजर बाबुओं की तरफ की। सारे बाबू झुंड बना कर कोल्ड-ड्रिंक (cold drink ) पी रहे थे। पहले बड़े बाबू पीते फिर बाकी। बीच-बीच मे भोंकने की आवाज़ आती तो कभी हंसने की, बड़ा असमंझस वाला माहौल था। मुझे समझ नहीं आ रहा था क्या सीखूँ ? मैंने अपने दफ़्तर जाने का निर्णय लिया।


जैसे ही मै दफ़्तर पहुँचा सामने मैंने अपने बॉस को जाते देखा। मैं भाग कर उनके पीछे गया। जाते-जाते मुझे शर्मा जी मिल गए, हम दोनों बॉस के पीछे हो लिए। शर्मा जी दाहिने और मैं बायँ। बीच मे बॉस ने रुककर अपनी फाइल खोली । इससे पहले मैं कुछ करता, शर्मा जी की फाइल खुल गई थी, यह दर्शाता था कि वो मुझसे ज्यादा अनुभवी हैं। और इससे पहले मैं कुछ सोचता, मेरे हाथों ने मेरी फाइल भी खुद ही खोल दी, यह दर्शाता है कि दफ़्तर मे दिमाग से ज्यादा शरीर अनुभवी हो जाता है । और बॉस की तरह हम दोनों भी पन्ने पलटने लगे। मुझे नहीं पता था कि मैं पेजों मैं क्या देख रहा हूँ। बस यह पता था की पन्ने पलटने हैं। फिर बॉस ने फाइल बंद की और दूर बैठे सफाई कर्मचारी की और देखते हुए बोले,”इस पेड़ के नीचे पत्ते कैसे गिरे हुए हैं? अपना काम नहीं करते तुम?” जैसे ही बॉस रुके, शर्मा जी कर्मचारी पर चढ़ गए। शर्मा जी को चिल्लाता देख मुझे ऐसा एहसास हुआ कि मानो अगर मैं नहीं चिल्लाया तो मेरा अस्तित्व खतरे मे पड़ जाएगा। मैं भी सफाई कर्मचारी पर बरस पड़ा। मेरे दिमाग का एक हिस्सा यह कह रहा था कि पेड़ हैं तो पत्ते गिरेंगे ही। लेकिन एक बड़ा हिस्सा कह रहा था, नौकरी तुम पेड़ की नहीं कर रहे हो। और बिना कुछ सोचे-समझे मैं बस बोलत रहा। फिर एकदम मैंने बॉस के कदमों की आवाज सुनी, पता चल बॉस आगे निकल गए हैं। एकाएक रुककर मैं भी बॉस के पीछे हो लिया। शर्मा जी पहले ही निकल गए थे ।


फिर हम ऑफिस की ओर चल दिए। जैसे ही हम बॉस के साथ ऑफिस मे पहुंचे सारे कर्मचारी अपनी कुर्सियों से कुछ ऐसे उछल के खड़े हुए मानो उनमे बिजली दोड़ गई हो। और सबने एक स्वर मे बोला,” गुड मॉर्निंग (good morning) सर”। ऑफिस की खिड़की के बाहर मुझे कुछ बैठे हुए कुत्तों का झुंड नजर आ रहा था। सब आराम से बैठे ही थे कि अचानक खड़े हुए और एक साथ भोंके। मैं समझ गया की कोई बड़ा कुत्ता पास आ गया होगा। तभी बॉस पीछे मुड़े और शर्मा जी और मुझसे बोले,” चलो ब्लैक टी (black tea ) पीते है।” हम दोनों ने अपनी गरदन हिलाई। खिड़की के बाहर भी झुंड अपनी गर्दन हिला रहा था।


पूरे किस्से के बाद मै कुछ सीखा हूँ या नहीं , पर एक बड़ा सवाल जरूर उठा गया है कि ‘आदमी कुत्ते से सीखता है या कुत्ता आदमी से?


By Alok Singh





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