top of page

द्रौपदी - एक योद्धा की कहानी

Feb 28, 2023
4 min read

By Parita Jain


उस घोर अंधेरी रात में,

द्रुपद के प्रतिशोध की लो उत्तेजित हुई थी,

मृत्यु की उस अग्नि में,

धर्म स्थापना के शक्ति की उत्पत्ति हुई थी!


धृष्टद्युम्न के सृजन के उपरांत,

वह अग्नि से जन्मी द्रुपद की विवशता बनी थी!

लेकर पिता से उम्र भर की पीड़ा का वरदान,

वह अंधियारे विश्व में उम्मीद की द्रौपदी बनी थी!


उसके हर कण में स्वाभिमान की तपीश सुलगती थी,

उसके क्रोध को प्रभा की ज्वाला लिपट्टी थी,

उसके तेज से हर अन्याय की मात होती थी,

उसके साहस में आत्मविश्वास की चिंगारियां उठती थी!


उसके नयन अकल्पनीय मोहना छलकाते थे!

उसके स्वर जैसेनि:सार मैं भी चेतना भर जाते थे!

उसके हृदय में सौम्यता का भंडार छिपा था,

उसके हर कदम से न्याय का मार्ग खिला था !


एक प्रातः रवि की किरण में,

उसने एक तेज पूर्ण चेहरे को देखा था!

देवालय के उस दिव्य वातावरण में,

उसने अपने ह्रदय में छिपी छवि के प्रतिबिंब को देखा था!


पिता द्रुपद के आयोजित स्वयंवर में भी जैसे,

उसके नयन उस यथेष्ट की ही तलाश कर रहे थे!

अज्ञात रूप में उस गांडीवधारी के आगमन से ही जैसे,

उसके मन के सारे दिए प्रकाश से भर गए थे!


फिर जैसे वह तेजस्वी आगे बढ़ रहा था,

उसका हर कदम मालिनी की धड़कनों को तेज कर रहा था!

तीरंदाजी की कला का पार्थ ने प्रदर्शन किया था,

विजय की पुष्प भरी वरमाला में जैसे यज्ञसैनी ने अर्जुन को सदा के लिए खुद से बांध लिया था!


खुदके प्रेम की उज्जवलता पाकर भी,

वह कहां उसे अपने दिए में प्रज्वलित कर पायी,

कुंती के उन अनजान वचनों में बंधी,

वह स्वयं को विभाजन केशोक मेझोंक गई!


असत्य के संहार से जुड़कर,

वह स्वार्थ को सदा के लिए त्याग गई!

धर्म के उन पांच आधारों को अपने मस्तिष्क पे सजाकर,

वह द्रौपदी से पांचाली बनने का हर आघात सह गई!


फिर जब इंद्रप्रस्थ कि वह जादुई दीवारें,

युधिष्ठिर के विजय के गीत गुनगुना रही थी!

दुर्योधन की मूर्खता पे,

वह पांडु पुत्रों के संग मंद मंद मुस्कुराई थी!


तिरस्कार की झांज में,

वह दुर्योधन प्रतिकार की आग में झुलस रहा था!

मामा शकुनि के साथ में,

पांडवों के खिलाफ उसने बदले का षड्यंत्र रचा था!


कौड़ियों के उस कपटी खेल में,

प्रपंच का दाव फेंका गया था!

दो भ्राताओ कि उस क्रीडा में,

द्रौपदी ने पांडवों की गरिमा होने की क्षति को सहा था!





उपहटी तो वैसे भी निर्माण से ही,

द्रौपदी केतकदीर मेंस्थायीथी!

युधिष्ठिर की उस चौसर की अपूर्णता ने,

उसकी आत्माइज्जत दांव पर लगाई थी!


वह दुर्योधन के अहंकार का मोहरा बनी थी,

उसके प्रतिष्ठा की भरी सभा में बलि चढ़ी थी!

दुःशासन के हाथों वह असहनीय अपराध हुआ था;

एक स्त्री की इज्जत का पीड़ादाई अपमान हुआ था!


घसीटते हुए वह उस सभा के बीच धकेली गई थी!

रेंगते हुए दानवता की गोद में झोंकी गई थी!

आर्यवर्ष की खामोशी के बादलों से घीरी थी,

वह स्त्री चीर हरण का निशाना बनी थी!


वहचीखी थी,वह चिल्लाई थी,

वह रोई थी, वहगिड़गिड़ाइथी,

उस दानकता के हास्य के बीच ही,

उसके प्रतीति की ह्रदयविदारक हत्या हुई थी!


उस पल से ही वह क्रोध की ऐसी पावक में जल रही थी,

जिसमें वह हर किसी को भस्म करने की मंशा रखती थी!

उसके हर अश्रु से जैसे,

अंत का प्रलय उभर रहा था!

उसकी हर चीख से जैसे,

तबाही का अभिशाप भड़क रहा था!

उसकेदेह के हर अंग से जैसे,

घृणा का भयानक अंधियारा धधक रहा था!


इस दुष्कर्म को होता देख भी,

वह आर्यवर्ष आंख मूंदे निर्बलता की बेड़ियों में जकड़ा रहा!

वहां उन दुष्कर्मी ओं के साथ ही,

हर उपस्थित मौनी भी अपराधी बना!


किंतु द्रौपदी का कर्म ही,

उसकी करूण तपस्या का परिणाम बना था!

अतीत में वह जिसके दर्द का सहारा बनी थी,

वह कृष्णा ही उसके संरक्षण का तदबीर बना था!


उस क्षण में जैसे वह सारी बिखर गई थी,

पीड़ा से घिरी, जैसे नर्क का अनुभव करने लगी थी!

अग्नि के तेज को जैसे वह खो बैठी थी!

क्लेशके उस भंवर में खुद के ही कर्मों को कोस रही थी!


किंतु गोविंद के साथ के सहारे,

उस अंधकार से करुणा के उद्योत मे पहुंची थी!

सृष्टि के धर्म की रक्षा के लिए,

वह तिरस्कार के द्वेष पूर्ण घूट भी पी गई थी!


वह हर नारी की शक्ति बनी थी,

मानहानि के खिलाफ आवाज बनी थी!

दुर्योधन तथा कीचक जैसे दुष्टों का अंत बनी थी!

हां वह महाभारत का सार बनी थी,

हां वह धर्म की ओर ले जाने वाला द्वार बनी थी!


युद्ध के पूर्व ही, वह उस आंधी की भी साक्षी बनी थी,

जो उसकी ममता के हर दीपक को बुझाने वाली थी!

वह इस वेदना के विचार से ही कांप उठती थी,

किंतु ना चाहते हुए भी व्यथा ही उसके जीवन की साथी बनी थी!


हां वह युद्ध को रोक सकती थी,

किंतु स्वार्थ को तो वह कबका निसर्ग चुकी थी!

हां द्रौपदी ही धर्म का आधार बनी थी,

स्वयं के संपूर्ण सुख का बलिदान कर वह विश्व केक्षेम का माध्यम बनी थी!


नहीं वह अपनों के बीच का द्वेष नहीं थी,

वह तो अपनों के रूप में छिपे विद्रोहियों का दर्पण बनी थी!

वह तो अपने पुत्रों को खुद का अवियोज्यअव्यय मानती थी!

किंतु धर्म के बदले यह रंजीदा उसकी नियति में लिखी थी!


हां वह युद्ध होना अनिवार्य था,

हा उन निर्दोष मृत्यु से वह भाग्य बाध्य था!

किंतु द्रौपदी सा वह धैर्य पूर्ण साहस ही उत्तेजक है,

क्योंकि हर युग में दुष्टता का विनाश करना आवश्यक है!


By Parita Jain




Recent Posts

See All
Dumb or In Love

By Kavya Mehulkumar Mehta are poets dumb — or just in love? to the world, they may seem dumb, but for them, love is inevitable. poems are reminders of love that can’t be forgotten, shan’t be forgotten

 
 
 
A Future So Azure

By Inayah Fathima Faeez Tomorrow looms unsure, muffled by the deep Thumbs twiddling, barriers never-ending, failure and nothing to reap At the shore lie the choices, imposing, leading to journeys impo

 
 
 
Letting Go In Layers

By Inayah Fathima Faeez Some part of us is cold and shrivelled, In a body of seemingly endless depth. Some part of us is heavy and dishevelled, Misery filling an unending breadth. Some part of us is

 
 
 

Comments

Rated 0 out of 5 stars.
No ratings yet

Add a rating
bottom of page