दो पैसे ...!
By Osin Poddar
माँ मैं शहर आया हूँ। दो पैसे कमाने आया हूँ। तुम्हारे जीवन में खुशियों के रंग भर सकू ऐसी उम्मीद लाया हूँ। माँ मैं शहर आया हूँ। तुमसे दूर रह न पाया हूँ। तुम्हारे याद में कितनी रातें सो न पाया हूँ। माँ मैं शहर आया हूँ।
कभी कच्ची कभी पक्की रोटी खाया हूँ।
उन रोटियों को जैसे तुमने मुझे खिलाया हो ,
इस सोच में उन रोटियों को मैं खाया हूँ।
माँ मैं शहर आया हूँ।
माँ जब भी तुम्हारी याद सताती है
तुम्हारे आंचल को अपने सीने से लगाया हूँ।
तुम्हारी दुआओं को मैं अपनी ताकत बनाया हूँ।
माँ मैं कला करता आया हूँ
उन कला को तुम्हारे प्यार से निखारते आया हूँ।
माँ मैं शहर आया हूँ।
दो पैसे कमाने आया हूँ।
By Osin Poddar

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