दो पहियों का फर्क
By Vandita Kumari
आखिर मुद्दातों की चाहत के बाद
नई कार घर आ ही गई , और हां !
गुप्ता जी के चेहरे की चमक भी,
आती भी क्यों नहीं पहली कार जो ले ली थी उन्होंने।
हां , अब वो भी” कार वाले” हो गए थे । और हां आज तो पड़ोस वाले मिश्रा जी भी देख कर मुस्कुराए थे।और कमाल की बात देखो दिल्ली वाली दीदी और शिमला वाली बुआ ने भी आज बरसों बाद फोन किया और कार के लिए बधाई दी। आज तो मोहल्ले वाले भी एक अलग नज़र से देख रहे थे,एक ने तो साथ पिकनिक चलने का न्योता भी दे दिया था।गुप्ता जी मन में एक अजीब सी उलझन में पड़े और होठों पर नकली मुस्कान लिए “नई कार “में बैठ बाज़ार की ओर बढ़े । आज सब अलग क्यों लग रहा था ? रोज़ तो अपनी पुरानी स्कूटर से वो इन्हीं गलियों से गुजरते थे,पर आज सब बदला बदला लग रहा था,आज उनकी इज्जत में अकस्मात एक इज़ाफ़ा हुआ था, और आज उन्हें “दो पहियों”का फर्क बड़ी आसानी से समझ आ रहा था।।
By Vandita Kumari

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